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अक़ल्लीयतों की तरक़्क़ी के लिए मज़ीद इक़दामात की ज़रूरत है

हैदराबाद।२९ जुलाई ।मुफ़क्किर मिल्लत अल्लामा अक़बालऒ ने कभी कहा था यूरोप को देखने के बाद मेरी राय बदल गई ही, इन मकतबों को इसी हालत में रहने दो, मुस्लमानों के बच्चों को इन्ही मदारिस में पढ़ने दो, अगर ये मिला और दरवेश ना रही, अगर मुस्ल

हैदराबाद।२९ जुलाई ।मुफ़क्किर मिल्लत अल्लामा अक़बालऒ ने कभी कहा था यूरोप को देखने के बाद मेरी राय बदल गई ही, इन मकतबों को इसी हालत में रहने दो, मुस्लमानों के बच्चों को इन्ही मदारिस में पढ़ने दो, अगर ये मिला और दरवेश ना रही, अगर मुस्लमान इन मदरसों के असर से महरूम होगए तो बिलकुल इसी तरह होगा जिस तरहअंदलुस में मुस्लमानों की 800 बरस की हुकूमत के बावजूद आज ग़रनाता और क़रतबा के खन्डरात और अलहमरा-ए-के सिवा-ए-वहां इस्लाम के पैरौ और इस्लामी तहज़ीब के आसार का कोई नक़्श नहीं मिलता।

शायद बर्र-ए-सग़ीर हिंद में अब ऐसी सूरत-ए-हाल पैदा होने के आसार दिखाई देने लगे हैं कि यहां भी शाइर इस्लाम के खन्डरात, आसार और बाक़ियात तो मिलेंगे मगर इस्लामी तमद्दुन के नुक़ूश नापैद होजाएंगी। मुस्लमान तो बाक़ी रहेंगे मगर इन में इस्लाम बाक़ी ना रहेगा।इस की असल वजह ये है कि दीनी मदारिस के तईं हमारी बे र्गुबती हद से ज़्यादा बढ़ती जा रही है हालाँकि इन मदारिस की पहले से ज़्यादा ज़रूरत बाक़ी है।

आज से 20-30 बरस क़बल मुस्लिम उम्मा के बेशतर बच्चे उर्दू मीडियम मदारिस में तालीम पाते थे जहां एक घंटा दीनी तालीम का भी हुआ करता था और हर मस्जिद में एक सुबह हया मुदर्रिसा चला करता था जहां हमारे बच्चे क़ुरआन मजीद और दीन की तालीम पाया करते थे मगर रफ़्ता रफ़्ता अंग्रेज़ी मीडियम तालीम के फ़रोग़ के नीतजा में सुबह हयामदरसों का भी नज़म ख़तन होगया चूँकि इन अंग्रेज़ी मीडियम स्कूल वालों ने ऐसे औक़ात रखे कि बच्चों को सुबह हया मदरसों को भेजने का मौक़ा ही ना मिले और बच्चों को स्कूल की तालीम में इस क़दर ज़्यादा मुनहमिक-ओ-मशग़ूल कर दिया गया कि उन्हें दीनी तालीम पाने की फ़ुर्सत ही ना मिली।

इस लिए फ़ी ज़माना अपने बच्चों में दीन का शऊर बेदारकरने के लिए ख़ानगी मुअल्लिम को रखना ज़रूरी होगया ही। देनी मदारिस ही की वजह से हमें ऐसे मुअल्लिम दस्तयाब हो सकें गे जो हमारी नई नसल को दीन इस्लाम की बुनियादी तालीम से बहरावर करसकेंगी। हम ने ये फ़रामोश कर दिया है कि एक दौर ऐसा भी था कि शहर हैदराबाद में माहे सियाम में सलोৃालतरवाएह में क़ुरआन मजीद की तकमील के लिए हुफ़्फ़ाज़ मुक़ामी तौर पर दस्तयाब नहीं हुआ करते थे और हमें बैरून-ए-रयासत के हुफ़्फ़ाज़पर इन्हिसार करना पड़ता था। मक्का मस्जिद में माहे सियाम से क़ब्ल बैरून-ए-रयासत केहुफ़्फ़ाज़ को मदऊ किया जाता था ताकि उन का इंतिख़ाब किया जा सके मगर आज दीनीमदारिस का जाल फैलने के बाइस ही ना सिर्फ हैदराबाद बल्कि मवाज़आत में भी हुफ़्फ़ाज़किराम बाआसानी दस्तयाब होजाते हैं।

ये एक हक़ीक़त है कि इस्लाम दुश्मन ताक़तों को मुस्लमानों के बाक़ी रहने का कोई अफ़सोस नहीं रहा है बल्कि उन्हें हमेशा से ये बात खटकती रहे कि इन में ईमान बाक़ी ना रहे और वो ये महसूस करने लगे कि जब तक मुस्लमानों में देनी मदारिस का नज़म बाक़ी रहेगा इन का ईमान ताज़ा रहेगा और उन के दिलों से ईमान को नहीं निकाला जा सकेगा।

यही वजह है कि वो इन दीनी मदारिस के ख़िलाफ़ हमेशा से साज़िशें करते रही। अमरीका में ट्रेड सैंटर पर हमला के बाद से उन दुश्मन ताक़तों को एक मौक़ा हासिल हुआ कि इन दीनी मदारिस की शहरग काट दी जाय जिस के लिए दहश्तगर्दी का हुआ खड़ा करते हुए ख़ासकर अमरीका-ओ-यूरोप और ख़लीज केमुख़य्यर अस्हाब और ख़ैराती इदारों पर तहदीदात आइद करना शुरू करदें और उन के ज़रीया दी जाने वाली इमदाद को मस्दूद कर दी जाए।

यही वजह है कि बर-ए-सग़ीर हिंद केदीनी मदारिस को बैरून-ए-मुल्क से इमदाद के रास्ते महिदूद बल्कि ख़तन होगई। देनीमदारिस के आमिलीन और सुफ़रा-ए-अमरीका-ओ-यूरोप के बड़े शहरों और ख़लीजी ममालिकका सफ़र करते हुए इमदाद हासिल किया करते थे मगर अब इन मुक़ामात पर इन से मुलाक़ात करने से भी लोग गुरेज़ करने लगी।

देनी मदारिस के मसारिफ़ का बेशतर हिस्सा बैरून-ए-मुल़्क की इमदाद पर मुनहसिर था मगर इस इमदाद से महरूमी के बाइस उन का कामिल इन्हिसार मुक़ामी इमदाद पर हो गया मगर अंदरून-ए-मुल्क ऐसी तहरीकें उठीं कि ज़कात-ओ-सदक़ात और अतयात की तर्जीहात बदल गईं और हमारे मुतमव्विल हज़रातअपनी इमदाद दीनी मदारिस को देने की बजाय मिल्लत-ए-इस्लामीया के नौजवानों की असरी तालीम में इआनत करने वाले इदारों को देना शुरू करदिया जिस के नतीजा में येमदारिस अपने मसारिफ़ को कम करने पर मजबूर हो गए जिस के लिए उन्हें जहां असातिज़ा की तादाद को घटाना पड़ा वहीं उन्हें तलबा-ए-की तादाद में भी तख़फ़ीफ़ करना पड़ा।

अगर ये कहा जाय तो ग़लत ना होगा कि जिन मदारिस दयनीय का वजूद मिल्लत-ए-इस्लामीया की ज़कात, सदक़ात, ख़ैरात-ओ-अतयात से ही है वो अब मिल्लत-ए-इस्लामीया की बेरुख़ी और बे तवज्जही का शिकार बनते जा रहे हैं। यही वजह है कि इन मदारिस मैं तलबा-ए-की तादाद में इज़ाफ़ा की बजाय गिरावट आना शुरू हो गई है। आज से 10 बरस क़ब्ल इनमदारिस में बच्चों की जितनी तादाद थी आज बेशतर मदारिस में इस की निस्फ़ तादाद भी बाक़ी नहीं रह गई है। इस की अहम वजह ये है कि इन मदारिस के माली वसाइल यकेबाद दीगर ख़तन होते जा रहे हैं।

देनी मदारिस के बदख़वाह मिल्लत में भी मौजूद रहे हैं और वो दानिस्ता और नादानिस्ता तौर पर इन मदारिस के ख़िलाफ़ मुहिम चलाने को अपनाफ़रीज़ा समझते हैं। कभी इन मदारिस के असातिज़ा की बदआमालियों को निशाना बनाया जाता तो कभी इन मदारिस के नज़मा-ए-की पर आसाइश ज़िंदगियों को उछाला जाता। देनी मदारिस के ज़िम्मेदारों पर कफ़ाफ़ के नाम पर यतीमों का माल हड़प कर लेने का इल्ज़ाम आइद किया जाता।

यक़ीनन कुछ असातिज़ा दीनी मदारिस और कुछ ज़िम्मा दारान दीनी मदारिस से ऐसी कुछ हरकतें सरज़द हुई हैं जो उन्हें जे़ब नहीं देतीं मगर इक्का दुक्कावाक़ियात को बुनियाद बनाकर दीनी मदारिस के ख़िलाफ़ मुहिम जोई मिल्लत-ए-इस्लामीया के हक़ में बेहतर नहीं ही। होना तो चाहीए था कि हम इन ख़ामीयों को दूर करने कीइजतिमाई कोशिश करते और ख़ुद भी इन दीनी मदारिस की निज़ामत में शामिल होकरइस्लाह की कोशिश करते मगर हम ने सिर्फ तन्क़ीद को अपना वतीरा बनालिया है।

ये बात भी काबिल-ए-ग़ौर है कि दीनी मदारिस के ख़िलाफ़ वही लोग ज़्यादा बढ़ चढ़ कर बोलते हैं जिन्हों ने कभी भी इन मदारिस की इमदाद नहीं की मगर इस मुख़ालिफ़ प्रोपगंडा का असरमिल्लत के इन बही ख्वाहों पर ज़रूर हुआ जो इन मदारिस की इमदाद किया करते थी। हमारे दानिश्वर तबक़ा की जानिब से असरी तालीम की ज़रूरत पर बहुत कुछ तावीलात पेश की जाने लगी है और मिल्लत की नई नसल को आला तालीम से रोशनास करवाने में ही ख़ैर का पहलू तलाश किया गया जबकि होना तो ये चाहिए था कि हम ज़कात, सदक़ात-ओ-अतयात में इन मदात का ख़्याल रखते जिस का ज़िक्र क़ुरआन मजीद में किया गया है।

बेशक हमें मिल्लत की असरी तालीम का भी ख़्याल रखना होगा और इस के लिए अपनी हलाल की कमाइयों में से कुछ हिस्सा निकालना होगा। अगर इस में तवाज़ुन को बरक़रारखा जाय और उन तमाम मदात पर ज़रूरत के लिहाज़ से तसर्रुफ़ किया जाय तो यक़ीननमिल्लत की हमा जहती तरक़्क़ी होगी।

इस लिए आज ज़रूरत इस बात की है कि जहां हममिल्लत की असरी तालीम पर तवज्जा दीं वहीं इन दीनी मदारिस के तहफ़्फ़ुज़ का भी ख़्याल रखें वर्ना वो दिन दूर नहीं जब ये दीनी मदारिस नापैद होते जाऐंगे और फिर हमें अपनी मसाजिद के लिए इमाम-ओ-ख़तीब और मोज़न भी ना मिलने लगेंगे और हमारे बच्चों की दीनी तर्बीयत के लिए कोई मुदर्रिस दस्तयाब ना होगा। शायर-ए-मशरिक़ अल्लामा अक़बालऒ के अंदाज़ कलाम के तो हम दिल से मोतरिफ़ हैं मगर हमारी ये बद बुख़ती है कि इन के कलाम की गहराई को समझते हुए भी नासमझी का मुज़ाहरा करते हैं।

अल्लामाइक़बाल ने माज़ी में की गई मिल्लत-ए-इस्लामीया की ग़ज़बनाक कोताही, ग़फ़लत औरनादानी और इस के नताइज का तजज़िया करते हुए बड़ी द्रव अंदेशी से काम लिया और अपने कलाम के ज़रीया ज़वालपज़ीर मुस्लिम उम्मा को फिर से उरूज की मंज़िलें तए करने की तरग़ीब दी और मुनकिरात, मकरूहात और ममनूआत से परहेज़ करने और एक नए अज़म के साथ मिल्लत की शीराज़ा बंदी के लिए उठ खड़े होने का हौसला दिया था।

यही वजह है कि अल्लामा इक़बाल ने इन दीनी मदारिस को जूं का तूं बरक़रार रखने का मश्वरा दिया था जिस की पासदारी करने की ज़रूरत है। हमें मिल्लत की नई नसल की असरी तालीम के लिए माली वसाइल जोड़ने के साथ साथ दीनी मदारिस के इस्तिहकाम का भी ख़्याल रखना होगा और ज़कात, सदक़ात और अतयात की इजराई में तवाज़ुन को मल्हूज़ रखना होगा।

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