Tuesday , December 12 2017

अदालतों को बतानी चाहिए मौत की सजा की खास वजहें

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अदालतों को किसी मुजरिम को मौत की सजा सुनाते वक्त ज़ुर्म के हालात और मुजरिम के किरदार को ध्यान में रखते हुए उन खुसूसी वजूहात का भी जिक्र करना चाहिए, जिसके लिए उसे मौत की सजा दी जा रही है। आली अदालत के मुताबिक

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अदालतों को किसी मुजरिम को मौत की सजा सुनाते वक्त ज़ुर्म के हालात और मुजरिम के किरदार को ध्यान में रखते हुए उन खुसूसी वजूहात का भी जिक्र करना चाहिए, जिसके लिए उसे मौत की सजा दी जा रही है। आली अदालत के मुताबिक रेप और कत्ल किसी मुजरिम को मौत की सजा देने के लिए काफी नहीं।

जस्टिस ए. के. पटनायक और जस्टिस ज्ञान सुधा मिश्रा की बेंच ने एक दहा (Decade) पुराने रेप और मर्डर के मामले में दो मुजरिमों की मौत की सजा की तस्दीक करने का राजस्थान हाई कोर्ट का फैसला मंसूख करते हुए दोनों को उम्र कैद की सजा दी। जजों ने इस मामले में मुजरिम राम निवास और बलवीर को मौत की सजा सुनाने के निचली अदालत के फैसले को गलत पाया और कहा कि उसे इस मामले को रेयरेस्ट ऑफ रेयर की कटेगरी में रखने की खुसूसी वजुहात का जिक्र करना चाहिए।

जजों ने कहा कि सज़ा के अम्ल इख्लाक की दफआ (Criminal Procedure Code Section) 354(3) की फराहमी के मुताबिक मौत की सजा सुनाते वक्त खुसूसी वजुहात का जिक्र करना चाहिए और इन खुसूसी वजूहात का जिक्र करते वक्त अदालत को ज़ुर्म और मुजरिम के बारे में ध्यान देना चाहिए।

कोर्ट ने Constitution Bench के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि रिकॉर्ड में ऐसी मवाद (Materials) है, जिससे पता चलता है कि Defendants की तरफ से मक्तूला से रेप और उसके कत्ल का ज़ुर्म वहशी था, लेकिन ऐसा कोई मवाद नहीं था जिससे Defendants के किरदार के बारे में यह साबित होता हो कि उन्हें मौत की सजा ही दी जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने Defendants को मौत की सजा सुनाते वक्त खुसूसी वजुहात का जिक्र किया और कहा कि एक नवंबर 2003 को वे फौतशुदा को अपने साथ ले गए और उन्होंने रात के अंधेरे में उससे रेप किया। इसके बाद उसके दुपट्टे से ही उसका गला घोंट दिया।

जजों ने कहा कि उनकी राय में निचली अदालत के फैसले में लिखे वजुहात से यह ज़ुर्म Rarest of the rare की कटेगरी में नहीं आता है, जिसके लिए उन्हें मौत की सजा दी जाए।

गौरतलब है कि हाई कोर्ट ने इस मामले में राम निवास और बलवीर नाम के दो मुजरिमों को इल्ज़ामात से बरी कर दिया था।

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