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अदालत का फैसला हिंदुस्तानी तहज़ीब के मुताबिक‌: इसरारुल-हक़ क़ासिमी

सुप्रीम कोर्ट ने हमजिंस परस्ती के ख़िलाफ़ फैसला दे कर हिंदुस्तानी तहज़ीब की हिफ़ाज़त का काम किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने हमजिंस परस्ती के ख़िलाफ़ फैसला दे कर हिंदुस्तानी तहज़ीब की हिफ़ाज़त का काम किया है।

इस फैसला के दूर रस बेहतर नताइज सामने आएंगे। आज जब कि हरतरफ़ बुराईयां फैल रही हैं और जिन्सी बेराह रवी में हैरत अंगेज़ तौर पर इज़ाफ़ा होरहा है तो इसे मैं सुप्रीम कोर्ट के लिए ज़रूरी थी। इन ख़्यालात का इज़हार मारूफ़ क़ौमी व अमली रहनुमा और लोक सभा के एम पी मौलाना इसरारुल-हक़ क़ासिमी ने यहां बयान जारी करके किया।

उन्होंने कहा कि हमजिंस परस्ती की वकालत करने वाले समाज को ग़लाज़त व‌ गंदगी से भर देना चाहते हैं और नई नसलों को गैर फ़ित्री कामों में मुलव्वस करके तबाह करदेना चाहते हैं। इस में सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला दे कर समाज को खुले आम इस बुराई से रोकने की कोशिश की है।

उन्होंने कहा कि किसी भी तहज़ीब और मज़हब में हमजिंसी परस्ती दुरुस्त नहीं है, और अक़ल सलीम रखने वाले लोग भी इसे क़तई नापसंद करते हैं, मगर बाअज़ लोग तहज़ीब और इंसानी व अख़लाक़ी इक़दार से बाहर निकल कर बेराह रवी में मुलव्वस हैं, वो दुनिया में मुख़्तलिफ़ मुक़ामात पर हमजिंस परस्ती केलिए क़ानूनी जवाज़ हासिल करने केलिए कोशिश करते हैं, अलमिया तो ये है कि हिंदुस्तान जैसे समाजी व तहजीबी मुल्क में भी वो हमजिंस परस्ती केलिए क़ानूनी जवाज़ चाहते हैं, इस में अदालत अज़मी ने हमजिंस परस्ती को जुर्म क़रार दे कर और 2009 के हाईकोर्ट के फैसला को बदनुमा क़रार दे कर तारीख साज़ कारनामा अंजाम दिया है।

हम अदालत अज़मी के इस फैसला का ख़ैर मक़द्दम करते हैं और उम्मीद करते हैं कि आगे भी हिंदुस्तान में नाजायज़ व ग़ैर फ़ित्री कामों की हौसला अफ़्ज़ाई नहीं की जाएगी। मौलाना इसरारुल-हक़ क़ासिमी ने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा कि बाअज़ गंदे ज़हनियत रखने वालों की मनफ़ी कोशिशों की वजह से हिंदुस्तानी समाज में बहुत ज़्यादा बुराईयां फैल रही हैं, बेहयाई आम होरही है और ज़नाकारी व फ़हाशी बढ़ती जा रही है जिस के एड्स और जराइम की शक्ल में इंतिहाई ख़तरनाक असरात ज़ाहिर होरहे हैं।

कोई दिन ऐसा नहीं गुज़रता जिस में इस्मतदरी के मुतअद्दिद वाक़ियात सामने ना आते हों। उन्होंने कहा कि ज़नाकारी या हमजिंस परस्ती का अमल बाहम रजामंदी के साथ हो या बिना रजामंदी के ग़लत अमल है और उसको बिलकुल भी नहीं सराहा जाना चाहिए बल्कि उस की मुज़म्मत की जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि आज चूँकि बेहयाई को बुरा नहीं समझा जा रहा है और बाहमी रजामंदी के साथ गैर मर्दो ख्वातीन के बीच‌ ताल्लुक़ात को मायूब ख़्याल नहीं किया जा रहा है, इस लिए ज़नाकारी के जबरी वाक़ियात भी कसरत से होरहे हैं और हमजिंस परस्तों की तादाद भी बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि अगर इस मुआमला में ज़राभी ढील दी गई तो हमारे मुल्क में जिन्सी बेराह रवी का सैलाब आजाएगा जिसके समाज पर निहायत मनफ़ी व गहरे असरात मुरत्तिब होंगे।

उन्होंने कहा कि बाअज़ वो लोग जो दफ़ा 377 में तरमीम की बात कररहे हैं, वो ग़लत कररहे हैं और अगर पार्लियामेंट में ये मसला आया तो में पुर ज़ोर तरीके से सुप्रीम कोर्ट की हिमायत करूंगा।

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