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अपनी ज़िंदगी के ख़ातमे से मुताल्लिक़ क़ानूनसाज़ी नाकाम

बर्तानवी दारुल अवाम ने एक ऐसे मुजव्वज़ा क़ानून को भारी अक्सरीयत से रद्द कर दिया है जिसमें लाइलाज बीमारी में मुबतला किसी भी बालिग़ शख़्स को अपनी ज़िंदगी के ख़ातमे से मुताल्लिक़ फ़ैसला करने का हक़ मिल सकता था।

बर्तानवी दारुल अवाम ने बीस बरसों बाद इस मौज़ू पर बहस की है। दारुल अवाम में पार्टी की वाबस्तगी से बालातर हो कर क़ानून पर राय शुमारी कराई गई जिसमें 330 मैंबरान ने इस मुजव्वज़ा क़ानून के ख़िलाफ़ जबकि 118 मैंबरान ने इस के हक़ में वोट डाला।

इस मुजव्वज़ा क़ानून में तजवीज़ किया गया था कि इंगलैंड और वेल्ज़ में लाइलाज बीमारी में मुबतला बालिग़ अफ़राद को तिब्बी निगरानी में अपनी जान को ख़त्म करने का हक़ मिलना चाहिए।

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