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अफ़ज़ल गंज वाटर टैंक के नीचे मंदिर की तामीर

शहर हैदराबाद फ़र्ख़ंदा बुनियाद को इस बात का एज़ाज़ हासिल है कि हिंदूस्तान भर में जितने अहम-वो-मुनफ़रद काम किए गए उन की बुनियाद का ताल्लुक़किसी ना किसी तरह हैदराबाद से रहा । उस्मानिया यूनीवर्सिटी ना सिर्फ़ हिंदूस्तान बल्कि दुन

शहर हैदराबाद फ़र्ख़ंदा बुनियाद को इस बात का एज़ाज़ हासिल है कि हिंदूस्तान भर में जितने अहम-वो-मुनफ़रद काम किए गए उन की बुनियाद का ताल्लुक़किसी ना किसी तरह हैदराबाद से रहा । उस्मानिया यूनीवर्सिटी ना सिर्फ़ हिंदूस्तान बल्कि दुनिया की पहली उर्दू यूनीवर्सिटी रही । दवाख़ाना उस्मानिया जब क़ायम किया गया उसे एशिया का सब से बड़ा हॉस्पिटल होने का एज़ाज़ हासिल हुआ । निज़ामीया तिब्बी शिफ़ाख़ाना का हुज़ूर निज़ाम आसिफ़ साबह नवाब मीर उसमान अलीख़ां बहादुर ने जब इफ़्तिताह अंजाम दिया दुनिया के इंतिहाई असरी और एशिया के सब से बड़े यूनानी शिफ़ाख़ाना की हैसियत से तारीख के पन्नों में इस का नाम दर्ज किया गया ।

इसी तरह रेलवे और तीरंगाह-वो-रेडियो स्टेशनों के मुआमला में भी हैदराबाद को हिंदूस्तान में नुमायां मुक़ाम हासिल रहा । 4.25 करोड़ की लागत से तामीर कर्दा इस वाटर टैंक का उस वक़्त के चीफ मिनिस्टर डाक्टर वाई इस राज शेखर रेड्डी ने इफ़्तिताह किया था । दरअसल इस मुक़ाम पर स्टेट सेंटर्ल लाइब्रेरी का साइक़ल स्टैंड हुआ करता था ।

तफ़सीलात के मुताबिक़ इस टैंक में कृष्णा से पानी सरबराह किया जाता है और फिर उसे गवलीपूरा , महाराजगंज , गोशा महल , पुतली बावली , और अफ़ज़ल गंज जैसे इलाक़ों में पहुंचाया जाता है अब मसला ये है कि शहर के मुख़्तलिफ़ तारीख़ी मुक़ामात से मुत्तसिलऔर सरकारी दफ़ातिर में नाजायज़ तौर पर मंदिरें बनाने का जो ख़तरनाक रुजहान शुरू हुआ है इस के एक हिस्सा के तौर पर इस टैंक के नीचे भी पुख़्ता मंदिर तामीर करदी गई हालाँकि माज़ी में यहां कोई मंदिर ही नहीं था जब किसी से सवाल किया जाता है कि आख़िर सरकारी दफ़ातिर के अहाता में मंदिर कौन तामीर कर रहा है तो जवाब दिया जाता है कि ख़ुद मुलाज़मीन ये काम कर रहे हैं।

अगर मुलाज़मीन की ख़ाहिश पर मंदिरों की तामीर पर ख़ामोशी इख़तियार की जाती है तो फिर सरकारी दफ़ातिर में तो हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई तमाम मज़ाहिब के मानने वाले होते हैं क्या हुकूमत पुलिस और मुताल्लिक़ा मह्कमाजात वहां मंदिर के साथ साथ मस्जिद गिरजाघर और गुरुद्वारा तामीर करने की इजाज़त देंगे? अगर इस तरह मसाजिद गिरजाघर और गुरुद्वारों की इजाज़त दी जाती है तो उसे हक़ीक़त में इंसाफ़ और गंगा जमुनी तहज़ीब कहा जाएगा ।

शहर के बाअज़ दानिश्वरों के ख़्याल में अगर इस तरीका पर अमल करते हुए जिन-जिन दफ़ातिर में मनादिर हैं वहां मसाजिद , गिरजाघर और गुरुद्वारे तामीर किए जाएं तो बेहतर रहेगा । दूसरे मज़ाहिब वालों को शिकायत नहीं रहेगी कि सरकारी दफ़्तरों में एक ही तबक़ा की मज़हबी इमारत तामीर की गई है । आसफ़जाही कुतुब ख़ाना में तामीर कर्दा मंदिर के बारे में कहा जाता है कि उस की तामीर एक रियासती वज़ीर की निगरानी में हुई और ज़राए से पता चला है कि मंदिर की तामीर में इस वज़ीर ने भारी रक़म भी बतौर अतीया पेश की । बहरहाल हुकूमत हो या वज़ीर बिला लेहाज़ मज़हब-वो-मिल्लत अवाम की ख़िदमत उन का फ़र्ज़ है ।

फ़िर्क़ा पर्वरी उन्हें हरगिज़ हरगिज़ ज़ेबा नहीं देती । आप को बतादें कि जब हम ने स्टेट सेंटर्ल लाइब्रेरी के अहाता में मंदिर के अचानक नमूदार यानी तामीर हो जाने के बारे में महिकमा वाटर वर्क़्स के मैनेजर टी रमेश से मुलाक़ात की कोशिश की तब वो अपने इजलास पर नहीं थे यहां इस बात का तज़किरा ज़रूरी होगा कि फरवरी में गवर्नर ई एस अल नरसिम्हन ने एक मकतूब के जवाब में कहा था कि किसी भी सरकारी दफ़ातिर में नए मज़हबी ढांचा तामीर करने की इजाज़त नहीं दी जाएगी ।

ज़रूरत इस बात की है कि गवर्नर ख़ुद इस मसला पर तवज्जा दें और अवाम में फैली बेचैनी को दूर करें । क़ारईन जहां तक स्टेट सेंटर्ल लाइब्रेरी का ताल्लुक़ है कभी ये कुतुब ख़ाना आसफ़िया या आसिफ़ जाहि कुतुब ख़ाना हुआ करती थी इस ग़ैरमामूली कुतुब ख़ाना की अजीमुश्शान इमारत को 1891 में नवाब इमाद-उल-मुल्क ने तामीर करवाया था ।

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