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अफ़्ग़ानिस्तान-शादियों में अखराजात कम करने नए क़वानीन बनाने की कोशिश

अफ़्ग़ानिस्तान में शादियों पर बेतहाशा ख़र्च को रोकने के लिए बनाए जाने वाले एक क़ानून की पाबंदी कराने में मुश्किलात पेश आ रही हैं। अफ़्ग़ानिस्तान के एक आला हुकूमती मुशीर ने कहा कि दुनिया के ग़रीब तरीन ममालिक में से एक अफ़्ग़ानिस

अफ़्ग़ानिस्तान में शादियों पर बेतहाशा ख़र्च को रोकने के लिए बनाए जाने वाले एक क़ानून की पाबंदी कराने में मुश्किलात पेश आ रही हैं। अफ़्ग़ानिस्तान के एक आला हुकूमती मुशीर ने कहा कि दुनिया के ग़रीब तरीन ममालिक में से एक अफ़्ग़ानिस्तान में शादीयों के हद से ज़्यादा अख़राजात को कम करने के मुजव्वज़ा क़ानून की मुख़ालिफ़त बहुत से क़ानूनसाज़ यानी अराकीन-ए-पार्लीयामेंट भी कर रहे हैं।

2001 में बचत पर बहुत ज़ोर देने वाली तालिबान हुकूमत के अमरीकी फ़ौज के हाथों ख़ातमे के बाद अफ़्ग़ानों ने बहुत पुर तअय्युश अंदाज़ में शादियों की तक़रीबात मनाने का सिलसिला दुबारा शुरू कर दिया जिन पर हज़ारों डालर ख़र्च किए जाते हैं। ये एक ऐसे मुल्क में हो रहा है जिस में औसत सालाना आमदनी 400 डॉलर से भी कम है।

लेकिन दूल्हा के ख़ानदान वालों की शिकायात पर, जिन्हें तमाम उख़रजात अदा करने और दुल्हन के हर मुतालिबे को पूरा करना होता है, हुकूमत ऐसे नए क़वानीन वज़ा करने पर काम कर रही है जिन के ज़रीये शादी की तक़रीबात में मेहमानों की तादाद को 300 तक महिदूद कर दिया जाये।
विज़ारत क़ानून के मुशीर क़ासिम हाशिम ज़ई ने कहा के विज़ारत क़ानून में इस पर ग़ौर किया जा रहा था कि शादी के अख़राजात को ज़वाबित का पाबंद बनाया जाये ताकि दूल्हा वालों को बहुत ज़्यादा तकलीफ़ ना उठाना पड़े। लेकिन फिर खास तौर पर बाअज़ माहिरीन ने कहा कि ये एक नजी मुआमला है और हमें प्राईवेट उमूर में मुदाख़िलत नहीं करनी चाहिए।

अफ़्ग़ानिस्तान में शादियों की तक़रीबात पुर तअय्युश होटलों या हालों में होती हैं, जिन में मलबूसात, खानों और मूसीक़ी पर बहुत ज़्यादा पैसा ख़र्च किया जाता है। दुल्हन वालों की तरफ़ से पूरी बिरादरी को मदऊ किया जाता है। पिछले साल अफ़्ग़ान हुकूमत ने पुर तअय्युश शादीयों और जहेज़ पर पाबंदी लगा दी थी जिस का इतलाक़ सिर्फ़ कुछ इलाक़ों पर होता था। इस का मक़सद नौजवानों को शादी के नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त अख़राजात की वजह से शादी को मुल्तवी ना करने की तरग़ीब दिलाना था।

इस के बाद से हुकूमत शादियों पर फुज़ूल खर्ची को रोकने के लिए इसी किस्म के क़वानीन पूरे मुल्क में नाफ़िज़ करने की कोशिश कर रही है।
नए क़ानून में औरतों के बगै़र बाज़ू वाले ऐसे मलबूसात पर भी पाबंदी लगाई जाएगी जिन से जिस्म बहुत खुल जाता है और जिन पर क़दामत पसंद मुसलमान एतराज़ करते हैं। नाक़िदीन का कहना है कि ये क़वानीन तालिबान के दौर के ज़वाबत की वापसी है, जिन के तहत शादीयों की तक़रीबात की निगरानी की जाती थी ताकि इन में मूसीक़ी की मुमानअत समेत दूसरे इस्लामी क़वानीन की ख़िलाफ़वरज़ी ना हो।

हाशिम ज़ई ने कहा कि ख़ुद सदर हामिद करज़ई की काबीना में भी मुजव्वज़ा क़ानून की काफ़ी मुख़ालिफ़त पाई जाती है। उन्हों ने कहा,अगर पार्लीयामेंट में क़ानून मंज़ूर हो जाता है तो फिर इस का नफ़ाज़ मुम्किन है लेकिन बहुत से लोगों का ये ख़्याल है कि शादी एक निजी मुआमला है और इस में मुदाख़िलत नहीं होनी चाहिए।

हाशिम ज़ई ने ये भी कहा कि अमली तौर पर इस क़ानून का नफ़ाज़ तक़रीबन ना मुम्किन होगा क्योंकि इस सूरत में हुकूमती अहलकारों को हर शादी में शरीक होना, मेहमानों की तादाद गिनना और अख़राजात का अंदाज़ा लगाना होगा। उन्हों ने कहा कि मुम्किन है कि बाअज़ लोग दुल्हन वालों से कहेंगे कि क़ानून के तहत आप हम से 300 से ज़्यादा मेहमानों को मदऊ करने का मुतालिबा नहीं कर सकते। इस तरह कुछ तबदीली तो आ सकती है लेकिन मेरे ख़्याल में शादी की तक़रीबात की निगरानी बहुत मुश्किल काम है।

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