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अबदुलक़दीर ख़ान की सज़ा के आज 21 साल मुकम्मल लेकिन रिहाई ……

नुमाइंदा ख़ुसूसी-आज से 21 साल क़बल 12 दिसमबर 990 को पेश आए एक इत्तिफ़ाक़ी वाक़िया के मुल्ज़िम अबदुलक़दीर ख़ान की ज़िंदगी का जायज़ा लें तो पता चलेगा कि इंसाफ़ की फ़राहमी में कहीं ना कहीं कोताही और तंगनज़री से काम लिया जा रहा है। जज़बा

नुमाइंदा ख़ुसूसी-आज से 21 साल क़बल 12 दिसमबर 990 को पेश आए एक इत्तिफ़ाक़ी वाक़िया के मुल्ज़िम अबदुलक़दीर ख़ान की ज़िंदगी का जायज़ा लें तो पता चलेगा कि इंसाफ़ की फ़राहमी में कहीं ना कहीं कोताही और तंगनज़री से काम लिया जा रहा है। जज़बात में आकर उठाए गए एक क़दम ने क़दीर ख़ान को अपनों के रहते हुए भी अपनों से दूर करदिया। इस एक इत्तिफ़ाक़ी वाक़िया ने क़दीर ख़ान को माँ बाप की चशम रहमत से और बच्चों को अपने बाप की शफत से महरूम करदिया।

बेटे की रिहाई की आस में तड़पती माँ ने काफ़ी इंतिज़ार के बाद बेटे को अल्लाह की अमान में दे कर दाई अजल को लब्बैक कह दिया। लड़कीयां भी शादी करके अपने माइका जाने से क़बल कुछ वक़्त बाप के साया रहमत में गुज़ारने और दुआएं लेकर माइका जाने की मुंतज़िर हैं। बेटे आज कॉलिज जा रहे हैं जिन्हें अपने बाप की उंगली पकड़ कर स्कूल जाना नसीब ना हुआ।

जो बाप अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने जाते हैं उन्हें देख कर तो उन के दिल में भी हसरत जागती थी होगी कि हमें अल्लाह ने इस शफ़क़त भरे सफ़र से क्यों महरूम रखा। । ये इंसान सज़ा से बढ़ कर सज़ा काट चुका है और हर हाल में इंसानी बुनियादों पर रिहाई का मुस्तहिक़ है।क़दीर ख़ान को जेल से रिहाई के बाद शादी के लायक़ होचुकी अपनी बेटीयों की शादी करनी है और 2 बेटों का मुस्तक़बिल भी संवारना है। अपनी बेटीयों की शादीयों और बेटों के मुस्तक़बिल की फ़िक्र ने भी क़दीर ख़ान को , जो 21 साल जेल में क़ैद-ओ-बंद की सऊबतें झील रहे हैं, मज़ीद नातवां बनादिया है। एक इत्तिफ़ाक़ी वाक़िया के लिए 21 साल जेल में गुज़ार चुके क़दीर ख़ान को अपनी घरेलू ज़िम्मेदारीयां भी अदा करनी हैं।

21 सालक़बल थम गई अपनी ज़िंदगी का दुबारा वहीं से आग़ाज़ करना है। बाप की मुहब्बत के लिए तड़प रहे बच्चों को वो प्यार देना है जो गुज़श्ता 21 बरसों से उन्हें मिल ना सका। शौहर के इंतिज़ार में बीवी के सर के बाल भी सफ़ैद होगए हैं। क़दीर ख़ान को अपनी बीवी के आँसू भी पोचने हैं जिस ने उन की शरीक-ए-हयात होने का फ़र्ज़ बख़ूबी और पूरी ज़िम्मेदारी के साथ निभाया है। क़दीर को अपनी अहलिया से वो सारी मुसीबतों की दास्तान सुननी है जो इस ने गुज़श्ता1 बरसों के दौरान तन्हा झेलते हुए क़दीर ख़ान की ग़ैरमौजूदगीमें अपने बच्चों को दुनिया की ज़ालिम नज़रों से बचाए रखा और सीने से लगाकर उन कीपरवरिश की।

जब कोई बच्चा अपनी माँ के पेट से बाहर आजाता है तो दुनिया पर इस केहुक़ूक़ और इस पर दुनिया के हुक़ूक़ का एहतिराम लाज़िम होजाता है। इसी लिए सज़ा देते वक़्त भी जुर्म की नौईयत को अच्छी तरह जांचा जाता है ताकि मुल्ज़िम को इस के किए से ज़्यादा की सज़ा ना मिले और इस के इंसानी हुक़ूक़ मुतास्सिर ना हूँ।क़वाइद के मुताबिक़ क़दीर ख़ान ने उम्र क़ैद की मुद्दत से ज़्यादा वक़्त जेल में काट लिया है , जहां तक उन के बरताओ की बात है तो उन के हुस्न-ए-सुलूक से साथी क़ैदी और जेल हुक्काम भी मुतास्सिरहोचुके हैं। अब सवाल ये पैदा होता है कि आख़िर क़दीर ख़ान की रिहाई में कौनसी चीज़ रुकावट बनी हुई है? ऐसा लगता है कि अदालत ने क़दीर ख़ान के क़सूर को ज़हन में रख कर नहीं बल्कि सारे ख़ानदान और सारे तबक़ा को ज़हन में रख कर सज़ा दी है।

जेल में साथी क़ैदीयों के साथ हुस्न-ए-सुलूक, बेहतर किरदार और हुक्काम के साथ तआवुन के बावजूद उन की रिहाई अमल में नहीं लाई जा रही है जिस से ऐसा महसूस होता है कि मुताल्लिक़ा हुक्काम किसी मख़सूस तबक़ा की नाराज़गी से बचने के लिए क़दीर ख़ान की रिहाई को मोख़र कररहे हैं जो कि इंसानी हुक़ूक़ की ख़िलाफ़वरज़ी और इंसाफ़ का गला घोंटने के मुतरादिफ़ है।

इस हफ़्ता में ना सिर्फ क़दीर ख़ान की क़ैद के 21 साल मुकम्मलहोरहे हैं बल्कि सारी दुनिया में आलमी यौम इंसानी हुक़ूक़ भी मनाया जा रहा है। ये यौमइस बात का तक़ाज़ा करता है कि दुनिया के हर शख़्स बिलख़सूस जेल में महरूस क़ैदीयों केइंसानी हुक़ूक़ का एहतिराम किया जाए । आलमी क़ानून का भी ये मानना है कि इंसाफ़ मेंताख़ीर इंसाफ़ का क़तल है। इस मौक़ा पर क़दीर ख़ान की अहलिया ने मुस्लिम तंज़ीमों, मिली-ओ-सयासी क़ाइदीन और हुक्काम से दर्दमंदाना अपील की कि वो उन के शौहर की इंसानी बुनियादों पर आजिलाना रिहाई के लिए मोस्सर इक़दामात करें जिस के लिए बारगाह रब्बुल इज्ज़त में वो सब के लिए दुआ गो रहेंगी।

रिहाई दे कभी लम्हों का ये हिसार मुझे के अपने आप से मिलना है एक बार मुझे

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