अमन की भीख मांगता पाकिस्तान का एक शहर

अमन की भीख मांगता पाकिस्तान का एक शहर
पाकिस्तान में आम चुनाव होने को हैं। इसलिए पूरे मुल्क में सयासी सरगर्मियां बढ़ रही हैं। सभी सयासी पार्टी अलग अलग वादे कर लोगों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन बलूचिस्तान सूबे की दारुल हुकूमत क्वेटा के लोग इन तमाम पार्टियों स

पाकिस्तान में आम चुनाव होने को हैं। इसलिए पूरे मुल्क में सयासी सरगर्मियां बढ़ रही हैं। सभी सयासी पार्टी अलग अलग वादे कर लोगों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन बलूचिस्तान सूबे की दारुल हुकूमत क्वेटा के लोग इन तमाम पार्टियों से बस एक वादा मांग रहे हैं।

क्वेटा के लोगों को सियासी जमातों और लीडरों से ये वादा चाहिए कि उनके शहर में अमन लौटे। दरअसल हाल के सालों में क्वेटा लगातार नस्ली और फिर्कावाराना तशद्दुद का शिकार रहा है। रियासत और सियासत ने वहां लोगों को आपस में बांट दिया है।

एक वक्त था जब क्वेटा अमनपसंद शहर के तौर पर जाना जाता था। गर्मियों की छुट्टियों में अकसर लोग यहां का रुख किया करते थे।

लेकिन अब यहां आना खतरे से खाली नहीं समझा जाता है। लोगों को जबरन गायब कर देना , अनजान लाशें, धमाके और ‘टारगेट किलिंग’ इस शहर की नई पहचान हैं।

बाचा खान चौक कभी व्यस्त कारोबारी इलाका हुआ करता था। यहां पाकिस्तान के दूसरे इलाकों से आने वाले लोग मुकामी चीजें बड़े शौक से खरीदा करते थे।

लेकिन बम धमाकों के बाद यहां खौफ का साया और सेक्युरिटी फोर्स का पहरा रहता है। सूखे मेवों की मार्केट कभी खरीददारों से भरी रहा करती थी | इन दिनों दुकानें तो भरी रहती हैं लेकिन बाजार वीरान दिखाई देता है।

शोरिश जदा हालात से जूझ रहे बलूचिस्तान में महरूमियों के अलावा सियासी और सामाजी मसले तो कई दहो से रहे हैं। लेकिन 2006 में हालात उस वक्त नाज़ुक हो गईं जब एक फौजी मुहिम में बुजुर्ग लीडर अकबर बुगती को मारा दिया गया।

इसके बाद नफरत और इंतेकाम की आग पूरे सूबे में फैल गई। इसका खमियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ा जो यहां बसे हुए थे। हजारा फिर्के के नौजवान जो खेल के मैदान के अच्छे खिलाड़ी माने जाते थे, अब चार दीवारियों में बंद हो कर रह गए हैं।

इमारत में बंद कमरे के अंदर कुछ नौजवान स्नूकर खेलते नजर आते हैं। समाज में आने वाली बदलावों से भी मीडिया भी खुद अलग नहीं रख सका है। यहां के हालात को दुनिया के सामने रखने की जद्दोजहद में पिछले पांच सालो में 20 से ज्यादा सहाफियों ने यहां अपनी जान गंवाई है।

सीनीयर सहाफी सलीम शाहिद कहते है कि मीडिया पर सरकारी और गैर सरकारी दोनों ही तरह के अनासिर का दबाव है। क्वेटा में भी इन दिनों इलेक्शन की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं।

किसके मंशूर में क्या है और क्या नहीं है। इसमें शहर के लोगों की कोई खास दिलचस्पी नहीं है। उनकी तो बस एक ही मांग है शहर का अमन वापस लौटा दो।

———बशुक्रिया: अमर उजाला

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