Saturday , December 16 2017

अमीन बी एक ख़ुद्दार और मेहनती ख़ातून

फटे पुराने कपड़े , नहीफ़-ओ-लागर जिस्म , कपकपाते हुए हाथ , झुर्रियों से भरा चेहरा , और चेहरे से अयाँ होती हुई ग़ुर्बत , लाचारगी , बेचारगी और थकावट , चेहरे की उड़ी हुई रौनक-ओ-रंगत , मुसलसल फ़ाक़ों से ख़ुशक होंट और ग़ुर्बत की मार की वजह से क़ब

फटे पुराने कपड़े , नहीफ़-ओ-लागर जिस्म , कपकपाते हुए हाथ , झुर्रियों से भरा चेहरा , और चेहरे से अयाँ होती हुई ग़ुर्बत , लाचारगी , बेचारगी और थकावट , चेहरे की उड़ी हुई रौनक-ओ-रंगत , मुसलसल फ़ाक़ों से ख़ुशक होंट और ग़ुर्बत की मार की वजह से क़बल अज़ वक़्त बुढ़ापा , कमज़ोरी और शिकस्तगी के आसार साफ़ इस के जिस्म ,

चेहरे और इस के क़दमों की चाल से वाज़ेह होरहे थे वो तक़रीबन 50 साला एक ज़ईफ़ (बूढी)ख़ातून होगी जो चन्दू लाल बारहदरी के एक कसीर झाड़ी वाले हिस्से में सूखी लकड़ियां जमा कर रही थी । फिर उस ने इन लकड़ियों को बांधा , लेकिन लकड़ियों का वज़न उठाने की तन्हा इस में ताक़त नहीं थी

चुनांचे उस की थकी थकी पलकें और हारी होई आंखें मदद और सहारे के लिये इधर उधर उठने लगीं , थोड़ी ही देर में चंद नौजवान आए और लक्कड़ी का वो भारी भरकम गट्ठा इस के सर पर रखदया वो इतना भारी वज़न उठाकर बड़ी मुश्किल से सँभल पाई ।

शायद इस का नातवां जिस्म इस बोझ को उठाने का मुतहम्मिल नहीं था वो लरज़ते और लड़खड़ाते क़दमों के साथ अपनी मंज़िल की तरफ़ जाने लगी , हम बड़े तहम्मुल के साथ ये दिल ख़राश मंज़र देख रहे थे ।

हालात की मारी इस ख़ातून से हम ने गुफ़्तगु की तो इस ने बताया कि इस का नाम अमीन बी है इस के दो बच्चे हैं शौहर शराब का आदी होचुका है । कोई काम नहीं करता इन सब की देख भाल और और गुज़र बसर का इंतिज़ाम मेरे ही ज़िम्मा है ।

इस के लिये जो काम मिला करलेती हूँ । हम ने जब घर का पता दरयाफ़त किया तो इस ने सिर्फ़ इतना बताया कि बहादुर पूरा के पास एक झोंपड़ी में रहती हूँ और मज़ीद तफ़सील बताने से साफ़ इनकार करदिया । हम ने पूछा कि घर में किसी के पास मोबाईल होगा उसका नंबर दे दें ।

लेकिन इस ने कुछ ना बताया । हम ने इस से बहुत कहा कि होसकता है कि कोई आप की मदद करना चाहे ।इस लिये पता या कम अज़ कम मोबाईल नंबर दे दें , लेकिन क़ारईन ! उस की ख़ुद्दारी का आलम देखें इस ने कहा कि साहब हम जैसे हैं वैसे ही रहने दो ,

मेहनत मज़दूरी कर के जी लेंगे किसी की मदद की ज़रूरत नहीं अल्लाह काफ़ी है । क़ारईन एक वो ज़माना था जब मुल्क के गोशा गोशा से लोग ये सुन कर हैदराबाद का रुख़ किया करते थे कि ये गरीब प्रवर शहर है ।

यहां कोई भूका नहीं सोता यहां मुख़्तलिफ़ सराय थे लेकिन आज बरसर-ए-इक्तदार हुकूमत और उस की इंतिज़ामीया की वजह से ना जाने कितने लोग शहर में परेशान हाल बेसहारा , बे यार-ओ-मददगार सड़कों की ख़ाक छानते फिरते हैं ।

क़ारईन ! इस ज़िमन में कुछ हमारे भी फ़राइज़ और ज़िम्मा दारियां होती हैं हमारे प्यारे नबी (स) की एक मुबारक हदीस में है कि अगर ज़कात ओ-सदक़ात को सही तौर पर निकाला जाये तो दुनिया में कोई गरीब ना रहे ।

लिहाज़ा हमें ग़ौर करना चाहीए कि हम से कहाँ कोताही होरही है । हम भी हुकूमत की तरह बरसर-ए-आम और लिपट लिपट कर मांगने वालों को दे देते हैं ।

लेकिन हमारी ज़कात अपने मुहल्ला , बस्ती , अहबाब-ओ-अका़रिब में मौजूद ख़ुद्दार और ग़ैरत मंद मुस्तहक़्क़ीन और ज़रूरतमंद तक नहीं पहुंच पाती इस के लिये कौन ज़िम्मेदार है । हमें इस अहम मसला पर एक बार फिर ग़ौर करना चाहीए ।।

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