अल्लाह तआला को राज़ी रखना बंदे पर फ़र्ज़ है

अल्लाह तआला को राज़ी रखना बंदे  पर फ़र्ज़ है
फ़ज़ाइल ला इलाहा इल्लल्लाह : अर्श से फ़र्श तक सब कुछ जिस के क़ब्ज़ा क़ुदरत में है और जिस ने हज़ा रहा अजाइब से ज़मीन को आरास्ता किया और हर ज़र्रा में अपनी क़ुदरत ज़ाहिर की, जिस को बनाया और पैदा किया, वो सिर्फ़ हमारे ही फ़ायदा के लिए हैं। वही हर

फ़ज़ाइल ला इलाहा इल्लल्लाह : अर्श से फ़र्श तक सब कुछ जिस के क़ब्ज़ा क़ुदरत में है और जिस ने हज़ा रहा अजाइब से ज़मीन को आरास्ता किया और हर ज़र्रा में अपनी क़ुदरत ज़ाहिर की, जिस को बनाया और पैदा किया, वो सिर्फ़ हमारे ही फ़ायदा के लिए हैं। वही हर वक्त हमारी हिफ़ाज़त करता है, हम को खिलाता, पिलाता, दुश्मनों के शर और मूज़ी जानवरों से बचाता और मुसीबत के वक़्त काम आता और दुख दर्द में शफ़क़त से पेश आता, हमारी ज़रूरीयात को मांगने से क़ब्ल अता फ़रमाता और हमारी नाफ़रमानियों से दरगुज़र और गुनाहों से चश्मपोशी फ़रमाता है।

जैसे बच्चे को माँ मुहब्बत भरी नज़र से देखती है, इसी तरह दिन में तीन सौ साठ मर्तबा मुहब्बत की नज़र से देखता है। आख़िरत में हमारे लिए अन्वा-ओ-इक़साम की ऐसी ऐसी नेअमतें तैयार कर रखी हैं, जिस को ना किसी आँख ने देखा, ना किसी कान ने सुना और ना किसी के दिल में ख़्याल गुज़रा।

अफ़सोस है बंदा पर कि ऐसे अल्लाह को छोड़कर औरों को दोस्त रखे और ग़ैर अल्लाह से मुहब्बत करे!। सारी कायनात का बनाने वाला वही एक माबूद हक़ीक़ी है, उसी का ख़ुलासा ला इलाहा इल्लल्लाह है और यही मानी ला इलाहा इल्लल्लाह के हैं। पस मालूम हुआ कि अल्लाह एक है और मौजूद है, उस को राज़ी रखना बंदा का फ़र्ज़ है, क्योंकि अगर वो नाराज़ हो जाये तो फिर कोई दूसरा ख़ुदा नहीं, जिस से मदद तलब की जा सके, आख़िर-ए-कार इसी से काम पड़ने वाला है।

ज़रा अक्ल से काम लें और तमाम कायनात की तरफ़ ग़ौर से देखें तो सब को हादिस-ओ-फ़ानी और मुस्तआर अल-वजूद पाएंगे और ये मालूम हो जाएगा कि इस आलम हसी के पर्दा में ज़रूर कोई ऐसा है, जिसकी तरफ़ सब मौजूदात के सिलसिले मुंतही होते हैं, जिस के हाथ में सब की डोरियां हैं, जिस के नूर की ये सब शुवाएं हैं।

सब का बनाने वाला और सब का अदम से वजूद में लाने वाला और जो किसी बात में किसी का मुहताज ना होने के इलावा तमाम उयूब से पाक है और कुल खूबियां इस में मौजूद हैं, उसका नाम अल्लाह है। जैसे ख़ुदाए तआला की सिफ़ात मख़लूक़ की सिफ़ात से जुदा हैं, ऐसे ही इस का नाम भी सब के नाम से मुमताज़ है।

इसी नाम अल्लाह को इस्म ज़ात कहते हैं और सालिक इसी के ज़रीया ख़ुदा रसीदा होता है।

अल्लाह तआला किस बात से राज़ी और किस से नाराज़ होते हैं? ये मालूम करने में चूँ कि हमारी अक़्लें वहां तक रसाई नहीं पा सकती थीं, इसलिए ख़ुदा रसीदा और ख़ास हस्तीयों की ज़रूरत हुई, जिन्होंने हमें अल्लाह की मशरूआत-ओ-ममनूआत मालूम कराए, उन्हें मुक़द्दस हज़रात को रसूल और पैग़ंबर कहते हैं।

अल्लाह तआला ने नबी आख़िर-ऊज़-ज़मा ख़त्म उल मुर्सलीन स०अ०व०मबऊस फ़रमाकर हम पर बड़ा फ़ज़ल फ़रमाया, वर्ना हम दीन-ओ-दुनिया में नाकाम-ओ-महरूम रह जाते और शैतान की इत्तेबा करने लगते। ना अल्लाह तआला की ज़ात-ओ-सिफ़ात का कुछ पता चलता और ना उमूर मुआद ही का इल्म होता। ये रहमतुल आलमीन स०अ०व० की बरकत और तुफ़ैल है कि हमें ईमान और आमाल सालेहा की तौफ़ीक़ हुई, जिस से दीन-ओ-दुनिया के सँभलने के सामान हो गए हैं।

अल्लाह तआला अपनी बेशुमार बरकतें और रहमतें नाज़िल फ़रमाए नबी करीम मुहम्मद मुस्तफ़ा स०अ‍०व० पर।

इत्तिफ़ाक़-ओ-मुहब्बत

इत्तिफ़ाक़ जब ही हो सकता है कि हर शख़्स अपने आप को सब से कम तर समझे और जो कुछ तकलीफ़ या ईज़ा पहुंचे उस को ख़ुदाए तआला की तरफ़ से जाने, तब कहीं ये कम्बख़्त नफ्स फ़र्मांबरदार होता है। ईमान और आमाल सालेहा से अल्लाह तआला आपस में मुहब्बत-ओ-इत्तिफ़ाक़ पैदा करते हैं। ईमान को मुस्तहकम कर लीजिए और आमाल सालेहा का एहतेमाम कीजिए तो ख़ुदबख़ुद हक़ीक़ी इत्तिफ़ाक़ पैदा हो जाता है।

इस के सिवा अगर इत्तेहाद हो तो समझ लीजिए कि वो महज़ एक ढांचा है, जिस में रूह-ए-इत्तिफ़ाक़ नहीं है। अल्लाह तआला के लिए आपस में मुहब्बत रखने वालों के लिए जो फ़ज़ाइल अहादीस में आए हैं, उन के मिनजुमला एक ये भी है कि ख़ुदाए तआला हश्र के होलनाक मैदान में इन मुख़लिस लोगों से फ़रमाएगा कि मेरे लिए आपस में मुहब्बत रखने वालो!

आओ तुम मुझ से राज़ी और में तुम से ख़ुश, तुम्हारी जगह आज मेरे अर्श के साया में है। बाहम मुहब्बत अल्लाह के वास्ते होनी चाहीए, ऐसी मुहब्बत के लिए ये ज़रूरी है कि कोई बात रंजीदा-ए-ख़ातिर होने की सूरत में भी मुहब्बत में ख़लल ना आए।

एक दूसरे से मुफ़ाहमत करके दिलों को साफ़ कर लें।

नफ़स के उयूब से आगाह किए जाने पर नाराज़ नहीं होना चाहीए। जिस से दिली मुहब्बत होती है, उसी को छेड़ा जाता है। पहले ख़ुद को देखिए कि वाक़ई वो ऐब मुझ में है भी या नहीं?। अगर नहीं है तो अल्लाह तआला का शुक्र बजा लाए कि गो मख़लूक़ मुझ को बुरा कह रही है, लेकिन में ख़ालिक़ के पास तो ऐसा नहीं हूँ। और अगर वाक़ई वो बुरी बात अपने अंदर हो तो उस को तर्क कर दे और मुख़ालिफ़ का शुक्रिया अदा करे कि भाई आप ने मेरे एक पोशीदा ऐब से मुझ को वाक़िफ़ कराया, जिस को मैं नहीं जानता था।

हमेशा इस बात का ख़्याल रखे कि ख़ुद को सब से हक़ीर समझे और जो कुछ दूसरे कहीं उस को बर्दाश्त करे। चंद रोज़ में आप देखेंगे कि आप को नफ़्स-ए-मुतमइन्ना हासिल हो जाएगा और मख़लूक़ ख़ुदा भी आप से राज़ी और ख़ुश रहेगी।

इक़तिबास: मवाइज़ हसना

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