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असम : SC ने कहा जिसके पास 1971 से पहले के दस्तावेज हैं वही भारतीय

गुवाहाटी : बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठियों के आने की वजह से असम सरकार के लिए यह लम्बे समय से सिरदर्द बना हुआ है कि देश के असली नागरिकों और घुसपैठियों की पहचान कैसे करें. कुछ समय पहले असम सरकार ने एक व्यवस्था शुरू की थी जिसके तहत ग्राम पंचायतों में बनने वाले जन्म प्रमाण पत्र को पहचान के लिए पर्याप्त दस्तावेज नहीं माना जा रहा था. सरकार का कहना था कि घुसपैठी ग्राम पंचायतों में आसानी से जन्म प्रमाणपत्र बनवा लेते हैं. मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को खारिज करते हुए कहा कि पंचायतों द्वारा जारी जन्म प्रमाणपत्र नागरिकता हासिल करने के लिए वैध सहायक दस्तावेज माना जाएगा. इससे पहले गुवाहाटी हाईकोर्ट ने पंचायत द्वारा जारी सर्टिफिकेट को अवैध करार दिया था. इसका असम में रहने वाली 29 लाख महिलाओं पर बुरा प्रभाव पड़ा था. इन महिलाओं के पास अपनी नागरिकता साबित करने के लिए जन्म प्रमाणपत्र ही एकमात्र दस्तावेज था. अब सुप्रीम कोर्ट ने उनके जन्म प्रमाण पत्र को वैधता दे दी है.

इसके अलावा असम सरकार ने नागरिकों को दो तरह की नागरिकता दी थी. करीब एक करोड़ नागरिकों को मूलनिवासी नागरिकों का दर्जा दिया था, वहीं अन्य को गैर मूलनिवासी नागरिकों का दर्जा दिया था. असम में गैर मूल निवासी नागरिकों की संख्या 3 करोड़ के करीब है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मूलनिवासियों और गैर मूल निवासियों के बीच कोई अंतर नहीं होगा. कोर्ट ने कहा कि नागरिकता के लिए सिर्फ एक कैटेगिरी होगी- भारत की नागरिकता.

असम में अब तक 25 मार्च 1971 से पहले के दस्तावेजों को मान्यता नहीं थी. यानी इससे पहले के दस्तावेज धारकों को असम सरकार भारतीय मानने से इनकार करती थी. अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी नागरिक के पास अपनी नागरिकता साबित करने के सबूत के तौर पर यदि 25 मार्च 1971 से पहले के दस्तावेज हैं तो उसे भारतीय माना जाएगा.

दरअसल, असम में यह मुद्दा इनदिनों उबाल पर है। यह माना जा रहा है कि अवैध घुसपैठ करनेवालों के लिए गांवबूढ़ा को प्रभावित कर फर्जी प्रमाणपत्र हासिल कर लेना कोई मुश्किल काम नहीं है। अय्युबी भी यह मानते हैं कि ऐसा संभव है। इसीलए वह ऐसे दस्तावेजों को री-वेरीफाइ कराने पर जोर दे रहे हैं। उधर असम में गरमाए इस मामले में पिछले दिनों मुसलिम संगठनों ने सरकार पर आरोप लगाया था कि वह राज्य में म्यामांर जैसी स्थिति उत्पन्न कर रही है। जमीयत उलेमा हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने नई दिल्ली में यह बयान देकर विवाद को और बढा दिया है कि ‘यदि 50 लाख लोगों को नागरिकता रजिस्टर से बाहर किया जाता है तो राज्य जलने लगेगा। हम या तो मारेंगे या मरेंगे।’

2011 की सेंसस रिपोर्ट में यह पाया गया कि असम के कुछ जिलों में मुस्लिम आबाद में बेतहाशा वृद्धि हुई है। धुबरी जिले में तो यह बढ़ोतरी 80 फीसदी तक दर्ज की गई। उसके बाद यह मुद्दा एकबार फिर से गरमा गया। जिसका राजनीतिक फायदा2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिला।

पिछले विधानसभा चुनाव में इस समस्या का समाधान करने का वादा ही उन्हें और भाजपा को सीएम की कुर्सी तक ले गया। हालांकि, एनआरसी में अपडेशन का काम पूरी तरह सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में किया जा रहा है। इस बारे में राजनीतिक बयान देने पर अदालत ने सोनोवाल को फटकार भी लगाई थी। इसीलिए सबकी निगाह सुप्रीम कोर्ट के रुख पर था, जहां यह तय होना है कि क्या पंचायत सेक्रेटरी सर्टिफिकेट, जिसपर राजस्व अधिकारी के भी हस्ताक्षर होते हैं, नागरिकता पंजीकरण के लिए मान्य होंगे या नहीं। इसपर सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को खारिज करते हुए कहा कि पंचायतों द्वारा जारी जन्म प्रमाणपत्र नागरिकता हासिल करने के लिए वैध सहायक दस्तावेज माना जाएगा और सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी नागरिक के पास अपनी नागरिकता साबित करने के सबूत के तौर पर 25 मार्च 1971 से पहले के दस्तावेज हैं तो उसे भारतीय माना जाएगा.

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