Thursday , December 14 2017

असल मक़सूद अल्लाह कि रजामंदी हासिल करना हैं

शाह मिस्र मक़ूक़स की ख़ाहिश पर हज़रत अमर बिन आस (रज़ी.) ने मक़ूक़स के पास दस आदमीयों का एक वफ़द भेजा, जिस के रईस हज़रत उबादा बिन साबित (रज़ी.) थे। आप का रंग काला था, मक़ूक़स ने इन को देखा तो घभरा गया और कहने लगा क्या मुस‌लमान एसे ही होते हैं, ये क्या जंग

शाह मिस्र मक़ूक़स की ख़ाहिश पर हज़रत अमर बिन आस (रज़ी.) ने मक़ूक़स के पास दस आदमीयों का एक वफ़द भेजा, जिस के रईस हज़रत उबादा बिन साबित (रज़ी.) थे। आप का रंग काला था, मक़ूक़स ने इन को देखा तो घभरा गया और कहने लगा क्या मुस‌लमान एसे ही होते हैं, ये क्या जंग करेंगे?।

मक़ूक़स की ये बातें सुन कर हज़रत उबादा (रज़ी.) ने यूं तक़रीर शुरू की: मैंने तुम्हारी बातें सुनीं, अब इन का जवाब सुनो!। जिन आदमीयों के पास से में आया हूँ, इन में एक हज़ार काले आदमी और भी मौजूद हैं, जिन का रंग मुझ से भी काला है और सूरत मुझ से ज़्यादा डरावनी और जलाली है। अगर तुम उन को देखो तो तुम्हारा क्या हाल होगा?।

सुनो! में अगरचे बूढ़ा हूँ और मेरी जवानी रुख़स्त हो चुकी है, लेकिन अलहमदु लिल्लाह! सौ आदमीयों से मैं तन्हा भी नहीं डरता, यही हाल मेरे ओर‌ साथीयों का भी है और इस का सबब‌ ये है कि हमारा असल‌ मक़सद अल्लाह के रासते में जिहाद करना है और इस की रज़ामंदी है।

हम लोग दुनिया पर कबजा करने या किसी दुनया कि लालच के लिए जंग नहीं करते, ख़ुदा ने हमारे लिए माले ग़नीमत हलाल किया है। हमें दुनया कि मालदारी की कोई परवाह नहीं, हमारे पास लाखों दिरहम हों या सिर्फ एक दिरहम, दोनों हालतें हमारे लिए बराबर हैं। हमारे लिए दुनयवी नेमतें कुच्छ एहमियत‌ नहीं रखतीं, हमारी असल नेमत परलोक कि राहत है।

हमारे रसूल स.व. ने हम से अह्द लिया है कि हम दुनिया के माल में से सिर्फ उसी क़दर लें, जिस से भूक रुक सके और सत्तर छिप सके।
मक़ूक़स ने ये तक़रीर सुनी तो कहा जो कुच्छ तुम ने कहा मैंने सुन लिया, बेशक तुम इन ही ख़ूबीयों के सबब‌ हम लोगों पर ग़ालिब आरे रहे हों और दुनिया की कोई ताक़त तुम्हारा मुक़ाबला ना करसकी, लेकिन इस वक़्त तुम्हारा मुक़ाबला मुझ से है।

याद रखों! मुझ से तुम हरगिज़ मुक़ाबला ना कर सको गे, मैंने इस क़दर फ़ौज जमा करली है कि तुम्हारा कामयाब‌ होना मुश्किल है। तुम्हारे लिए बेहतर ये है कि मैं तुम में से हर एक शख़्स को दो दो दीनार और तुम्हारे ख़लीफ़ा को एक हज़ार दीनार देता हूँ, तुम ये रक़म लो और वापिस चले जाओं।

हज़रत उबादा (रज़ी.)ये बातें सुनते रहे और कहा तुम और तुम्हारे साथी धोके में ना रहें, तुम हमें रुमीयों के लश्कर से डराते हो, तुम्हारी इस बातचित ने हमारे जज़बा जिहाद को और भी ज़्यादा उभार दिया है। अब हम दो बरकतों में से एक ज़रूर हासिल करेंगे, या तो हम काम्याब‌ होंगे या शहिद होंजाएंगे। हम में से कोई शख़्स एसा नहीं जो सुबह‍ ओर‌-शाम ख़ुदा से शहिद होने की दुआ ना मांगता हो। आख़िर कार‌ जंग शुरू हो गई और वही कुछ हुआ, जो हज़रत उबादा (रज़ी.) ने कहा था, यानी मुस्लमान मिस्र पर क़ाबिज़ हो गए और मुजाहिदीन ने जो कुछ कहा वो कर दिखाया। (तारीख़ इस्लाम)

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