Tuesday , December 12 2017

अज़मत‍-ए‍-मुस्तफा सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम

अज़मत ए मुस्तफा स०अ०व० को क़ुरआन मजीद के हवालों से समझने के लिए सबसे पहले हमें इस आयत-ए-करीमा के मफ़हूम पर ग़ौर करना चाहीए। अल्लाह तआला का इरशाद है बेशक अल्लाह और इसके फ़रिश्ते नबी (स०अ०व०)पर दरूद भेजते हैं, ए ईमान वालो तुम भी इन (नबी) पर दर

अज़मत ए मुस्तफा स०अ०व० को क़ुरआन मजीद के हवालों से समझने के लिए सबसे पहले हमें इस आयत-ए-करीमा के मफ़हूम पर ग़ौर करना चाहीए। अल्लाह तआला का इरशाद है बेशक अल्लाह और इसके फ़रिश्ते नबी (स०अ०व०)पर दरूद भेजते हैं, ए ईमान वालो तुम भी इन (नबी) पर दरूद-ओ-सलाम भेजा करो। बेशक ऐसा और कोई अमल नहीं, जो कि अल्लाह तआला ख़ुद करे और ईमान वालों को भी ताकीद करे। यानी तमाम इबादतें तो अल्लाह तआला के लिए हैं, जो कि फ़रिश्ते और अहल ईमान करते हैं, लेकिन हुज़ूर रहमतुल आलमीन स०अ०व०पर दरूद-ओ-सलाम भेजने की जब बात आती है तो अल्लाह तआला ने ख़ुद ये फ़रमाया कि बेशक ये अमल अल्लाह तआला और इसके फ़रिश्ते भी करते हैं और ईमान वालों को ख़ास तौर पर ये ताकीद की जाती है कि वो भी ये अमल हमेशा करते रहें।

अज़मत ए मुस्तफ़ा स०अ०व० को ज़ाहिर करने के लिए अल्लाह तआला ने क़ुरआन मजीद की कई सूरतों में ज़िक्र फ़रमाया है, ताकी ईमान वाले आप स०अ०व० की अज़मत को दिल-ओ-जान से मान लें और दोनों जहां की तमाम नेअमतों से (जो उनको मयस्सर हैं) ज़्यादा आप से मुहब्बत करें। यानी अपने माँ बाप, रिश्तेदार, ऑल-ओ-औलाद, माल-ओ-दौलत, सबसे ज़्यादा हुज़ूर अकरम स०अ०व०) से मुहब्बत करें। सूरा वालज़ही में अल्लाह तआला ने हुज़ूर अकरम स०अ०व० को मुख़ातिब करके इरशाद फ़रमाया, जिसका मफ़हूम ये है कि तुम्हारी हालत हर लम्हा तरक़्क़ी पर है और ये तरक़्क़ी इस वजह से है कि हम ने तुम पर बख़शिश की है और आइन्दा के लिए हम वाअदा करते हैं और ऐलान करते हैं कि हम तुम को दुनिया-ओ-आख़िरत में इतनी नेअमतें देंगे कि तुम राज़ी हो जाओगे।

मगर हुज़ूर अकरम स०अ०व० की अपनी उम्मत पर शफ़क्क़त देखिए कि इस ख़ुशख़बरी को सुनकर आप ने फ़रमाया कि हम उस वक़्त तक राज़ी ना होंगे, जब तक कि हमारा एक भी उम्मती दोज़ख़ में रहेगा। ये हमारे लिए आपकी शफ़ाअत और नजात का बहुत बड़ा परवाना है।

फिर इस सूरा मुबारका की तफ़सीर में ये बयान हुआ है कि जो नेअमतें हम ने तुम को दी हैं, उनकी क़दर-ओ-क़ीमत लोगों के सामने ख़ूब बयान करो, ताकि दूसरे लोग भी हमारी नेअमतों के कद्रदां हों, उनके तलबगार बन कर उन्हें हासिल करने की कोशिश करें और हमारी बख़शिश से मालामाल हों।

ख़ास तौर पर क़ुरान-ए-पाक की इशाअत की तरफ़ पूरी पूरी तवज्जा करो, क्योंकि ये हमारी सबसे बड़ी दौलत है और तक़सीम करने के लिए ही तुम्हारे हवाले की गई है। इस दौलत को ख़ूब लूटाओ और इसका फै़जे आम करो। ये उम्मत मुहम्मद स०अ०व० की बहुत बड़ी ख़ुशनसीबी है कि हुज़ूर अकरम स०अ०व० के तुफ़ैल क़ुरान-ए-पाक भी मिला और क़ुरआन वाला भी।

हुज़ूर अकरम स०अ०व० इशाअत इस्लाम का काम बराबर आगे बढ़ाते रहे। मुश्किलात और मुख़ालफ़तों के हुजूम में जब कि ज़ाहिरी तौर पर तसकीन-ओ-तश्फ़ी का कोई सामान ना था, सूरा अलम नश्रह में अल्लाह तआला की तरफ़ से तसकीन-ओ-तश्फ़ी, आपके बुलंद मुक़ाम का ऐलान और आइन्दा के लिए पेशगोई की गई। तफ़सीर में है कि अल्लाह तआला ने अपने प्यारे नबी स०अ०व० पर अपने चंद इनामात का ज़िक्र फ़रमाकर आप की तसल्ली फ़रमाई।

दोस्त और दुश्मन सबको आप के बुलंद मर्तबा से आगाह फ़रमाया। आपको और आपके जांनिसार साथीयों को ख़ुशख़बरी सुनाई कि हालात कितने ही दीगर गों (मुख़ालिफ़) क्यों ना हूँ, यक़ीन रखो कि तुम्हारे दुश्मन नाकाम होंगे। इस्लाम की इशाअत का काम बढ़ता रहेगा और आप को फ़तह अज़ीम हासिल होगी और हम ने तुम्हारा ज़िक्र बुलंद किया।

अल्लाह तआला को ख़ास तौर पर अपने महबूब स०अ०व० के ज़िक्र पाक और इस्म मुबारक को बुलंद करना मंज़ूर है और इसने फ़र्श से अर्श तक आपका ज़िक्र बुलंद किया और इसका इंतेज़ाम कई तरह से फ़रमाया। कलिमा तैय्यबा में अल्लाह तआला ने अपने नाम के साथ अपने हबीब स०अ०व० का नाम रखा, जो अज़ान में, इक़ामत में, अत्तिहयात में और ख़ुतबा में लाज़िमी तौर पर पढ़ा जाता है।

आज दुनिया के गोशा गोशा में मुसलमान और मसाजिद हैं, हर मस्जिद से रोज़ाना पाँच वक़्त की अजानों में अल्लाह तआला के नाम के साथ जिस नाम की पुकार फ़िज़ा में गूंजती है, वो हुज़ूर अकरम स०अ०व० का नाम नामी इस्म गिरामी है।

करोड़ों मुस्लमान अपनी नमाज़ों में आप सिल्ली अल्लाह अलैहि वसल्लम पर दरूद-ओ-सलाम भेजते हैं।

आज दुनिया देख रही है कि हुज़ूर अकरम स०अ०व० के दुश्मन बेनाम-ओ-निशान हैं, इनका कोई नामलेवा नहीं है, बल्कि इंसानियत उनके नाम पर शरमाती है। जब कि इस के बरख़िलाफ़ अज़मत मुस्तफ़ा स०अ०व० का इज़हार इस तरह हो रहा है कि आप का इस्म मुबारक तमाम नामों का सरताज है, आपके नामलेवा सारी दुनिया में फैले हुए हैं।

आप की सीरत पाक लिख कर शाय करते हैं, दिन रात मोमिन आपकी शान में सलात-ओ-सलाम और नाअतें पढ़ते रहते हैं और माह रबी उल-नूर में ईद मीलाद उन्नबी स०अ०व० जोश-ओ-ख़ुरोश के साथ मनाते हैं।

अल्लाह तआला अज़मत मुस्तफ़ा स०अ०व० और आपके मुक़ाम-ओ-मर्तबा को ज़ाहिर करने के लिए सूरा मुदस्सिर और सूरा नजम में भी ज़िक्र फ़रमाया है, जिसका मफ़हूम ये है कि जो क़ुरआन आप सुनाते हैं वो वही इलाही है और एक पाक फ़रिश्ता जिब्रईल अलैहिस्सलाम के ज़रीया नाज़िल की जाती है। मुफ़स्सिरीन ने लिखा है कि सूरा मुदस्सिर की इबतिदाई आयात जिस वक़्त नाज़िल हुईं, उस वक़्त ये वाक़िया पेश आया था।

हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम को आप स०अ०व० ने उनकी असली सूरत में कोहे हिरा के पास मशरिक़ी उफ़ुक़ पर देखा था। ये शरफ़ बजाय ख़ुद इमतियाज़ी शान रखता है, क्योंकि दीगर अंबिया-ए-किराम को ये शरफ़ हासिल नहीं हुआ। फिर सूरा नजम में इरशाद होता है कि वो (नबी स०अ‍०व०) अपनी ख़ाहिश से कुछ नहीं कहते, इनका कहना तो वही (इलाही) है, जो उनकी तरफ़ भेजी जाती है।

दरअसल सरदार उन क़ुरैश वही की सच्चाई को नहीं मानते थे, इसलिए हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम की सिफ़ात और कमालात बयान किए गए। लिहाज़ा वही के बारे में किसी तरह के शक-ओ-शुबा की गुंजाइश नहीं है, यानी आपका कहना वही इलाही है।

ये अज़मत मुस्तफ़ा स०अ०व० की मेराज नहीं तो क्या है? कि आपने बताया कि ये क़ुरआन है तो वो क़ुरआन हुआ और जब आपने तशरीहन कुछ बयान फ़रमाया तो वो हदीस पाक बन गई। मुफ़स्सिरीन ने लिखा है कि शब ए मेराज में हुज़ूर अकरम स०व०अ०ने हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम को सिदरतुल मुम्तहा के पास दूसरी मर्तबा असली सूरत में देखा।

सिदरतुल मुम्तहा सातवें आसमान पर गोया दोनों आलिमों के दरमीयान एक सरहदी चौकी है। अहकाम इलाही पहले सिदरतुल मुम्तहा पर नाज़िल होते हैं, फिर वहां से फ़रिश्ते उनको लेते हैं और हसब हिदायत इस आलम पर जारी करते हैं। इन हक़ीक़तों को जानने के बाद हमारे दिल-ओ-दिमाग़ में और भी ज़्यादा अज़मत मुस्तफ़ा स०अ०व०बस जाना चाहीए और हमें हमेशा अपने प्यारे आक़ा स०अ०व० पर दरूद-ओ-सलाम का नज़राना पेश करते रहना चाहीए।

TOPPOPULARRECENT