Friday , December 15 2017

अज़मत ए मुस्तफ़ा स.व., बजूबान ए क़ुरआन

अज़मत मूस्तफ़ा स.व.

अज़मत मूस्तफ़ा स.व. को क़ुरआन मजीद के हवालों से समझने के लिए सब से पहले हमें इस आयत-ए-करीमा के मफ़हूम पर ग़ौर करना चाहीए। अल्लाह ताला का इरशाद है बेशक अल्लाह और इस के फ़रिश्ते नबी (स.व.) पर दरूद भेजते हैं, ए ईमान वालो तुम भी इन (नबी) पर दरूद-ओ-सलाम भेजा करो।
बेशक ऐसा और कोई अमल नहीं, जो कि अल्लाह ताला ख़ुद करे और ईमान वालों को भी ताकीद करे। यानी तमाम इबादतें तो अल्लाह ताला के लिए हैं, जो कि फ़रिश्ते और अहल ईमान करते हैं, लेकिन हुज़ूर रहमतू लीलआलमीन स.व. पर दरूद-ओ-सलाम भेजने की जब बात आती है तो अल्लाह ताला ने ख़ुद ये फ़रमाया कि बेशक ये अमल अल्लाह ताला और इस के फ़रिश्ते भी करते हैं और ईमान वालों को ख़ास तौर पर ये ताकीद की जाती है कि वो भी ये अमल हमेशा करते रहें।

अज़मत मुस्तफ़ा स.व.को ज़ाहिर करने के लिए अल्लाह ताला ने क़ुरआन मजीद की कई सूरतों में ज़िक्र फ़रमाया है, ताकि ईमान वाले आप स.व. की अज़मत को दिल-ओ-जान से मान लें और दोनों जहां की तमाम नेअमतों से (जो उन को मयस्सर हैं) ज़्यादा आप से मुहब्बत करें। यानी अपने माँ बाप, रिश्तेदार, आल-ओ-औलाद, माल-ओ-दौलत, सब से ज़्यादा हुज़ूर अकरम स.व. से मुहब्बत करें।

सूरा वज्जोहा में अल्लाह ताला ने हुज़ूर अकरम स.व.को मुख़ातब(संबोधीत) करके इरशाद फ़रमाया, जिस का मफ़हूम(अर्थ) ये है कि तुम्हारी हालत हर लम्हा तरक़्क़ी पर है और ये तरक़्क़ी इस वजह से है कि हम ने तुम पर बख़शिश की है और आइन्दा के लिए हम वाय‌दा करते हैं और ऐलान करते हैं कि हम तुम को दुनिया-ओ-आख़िरत में इतनी नेअमतें देंगे कि तुम राज़ी हो जाओं गे। मगर हुज़ूर अकरम स.व. की अपनी उम्मत पर शफ़क़त देखिए कि इस ख़ुशख़बरी को सुन कर आप ने फ़रमाया कि हम उस वक़्त तक राज़ी ना होंगे, जब तक कि हमारा एक भी उम्मती दोज़ख़ में रहेगा। ये हमारे लिए आप की शफ़ाअत और नजात(काम्याबी) का बहुत बड़ा परवाना(आदेश) है।

फिर इस सूरा मुबारका की तफ़सीर में ये ब्यान हुआ है कि जो नेअमतें हम ने तुम को दी हैं, उन की क़दर-ओ-क़ीमत लोगों के सामने ख़ूब ब्यान करो, ताकि दूसरे लोग भी हमारी नेअमतों के कद्र दां हों, उन के तलबगार बन कर उन्हें हासिल करने की कोशिश करें और हमारी बख़शिश से मालामाल हों। ख़ास तौर पर क़ुरआन-ए-पाक की इशाअत(प्रचार) की तरफ़ पूरी पूरी तवज्जा करो, क्योंकि ये हमारी सब से बड़ी दौलत है और तक़सीम करने के लिए ही तुम्हारे हवाले की गई है। इस दौलत को ख़ूब लटाओं और इस का फै़ज आम करो। ये उम्मत मुहम्मद स.व. की बहुत बड़ी ख़ुशनसीबी(भागयता) है कि हुज़ूर अकरम स.व. के तुफ़ैल(धारा) क़ुरान-ए-पाक भी मिला और क़ुरआन वाला भी।

हुज़ूर अकरम स.व. इशाअत इस्लाम(प्रचार) का काम बराबर आगे बढ़ाते रहे। मुश्किलात और मुख़ालफ़तों के हुजूम(भीड) में जब कि ज़ाहिरी तौर पर तसकीन‍ ओ‍ तशशफ्फ़ी का कोई सामान ना था, सूरा अलम नश्रह में अल्लाह ताला की तरफ़ से तसकीन-ओ‍तशशफ्फ़ी, आप के बुलंद मुक़ाम का ऐलान और आइन्दा के लिए पेशगोई की गई।

तफ़सीर में है कि अल्लाह ताला ने अपने प्यारे नबी स.व. पर अपने चंद इनामात का ज़िक्र फ़रमाकर आप की तसल्ली फ़रमाई। दोस्त और दुश्मन सब को आप के बलंद मर्तबा से आगाह फ़रमाया। आप को और आप के जांनिसार(जान देने वाले) साथीयों को ख़ुशख़बरी सुनाई कि हालात कितने ही दीगर गों (मुख़ालिफ़) क्यों ना हों, यक़ीन रखों कि तुम्हारे दुश्मन नाकाम होंगे।
इस्लाम की इशाअत(प्रचार) का काम बढ़ता रहेगा और आप को फ़तह ए अज़ीम(बडि काम्याबी) हासिल होगी और हम ने तुम्हारा ज़िक्र बुलंद किया। अल्लाह ताला को ख़ास तौर पर अपने महबूब स.व. के ज़िक्र पाक और इस्मे मुबारक को बुलंद करना मंज़ूर है और इस ने फ़र्श से अर्श(आकाश से पाताल्) तक आप का ज़िक्र बुलंद किया और इस का इंतेज़ाम कई तरह से फ़रमाया। कलिमा तय्यबा में अल्लाह ताला ने अपने नाम के साथ अपने हबीब स.व. का नाम रखा, जो अज़ान में, इक़ामत मैं, अत्तहीय्यात में और ख़ुतबा में लाज़िमी तौर पर पढ़ा जाता है।

आज दुनिया के गोशा गोशा में मुस्लमान और मसाजिद हैं, हर मस्जिद से रोज़ाना पाँच वक़्त की अजानों में अल्लाह ताला के नाम के साथ जिस नाम की पुकार फ़िज़ा में गूंजती है, वो हुज़ूर अकरम स.व. का नाम नामी इस्म गिरामी है। करोड़ों मुस्लमान अपनी नमाज़ों में आप स.व. पर दरूद-ओ-सलाम भेजते हैं।

अल्लाह ताला ने हुज़ूर अकरम स.व. को तसल्ली और ख़ुशख़बरी देने के लिए और दुश्मनों की तंबीह‌ के लिए सूरा कौसर नाज़िल फ़रमाई। तफ़सीर में है कि कौसर से एक मुराद ख़ैर ए कसीर भी है, अल्लाह ताला ने अपने हबीब स.व. को जो दीनी और दुन्यवी, ज़ाहिरी और बातिनी हर तरह की नेअमतें और बरकतें अता फ़रमाई हैं, वो इतनी ज़्यादा हैं कि इन का शुमार नहीं किया जा सकता। कौसर से मुराद वो हौज़ ए कौसर भी है, जो मेह्शर में या जन्नत में आप स.व. को अता होगा, जिस के पानी से हुज़ूर अकरम स.व. अपनी उम्मत को सेराब करेंगे। फिर आगे इरशाद होता है कि आप का दुश्मन ही अबतर होगा और बेनाम-ओ-निशान रहेगा। वाज़िह हो कि आज तारीख़ इस पेशीनगोई(पेहले कही हूई बातों) की सच्चाई पर गवाह है। आज दुनिया देख रही है कि हुज़ूर अकरम स.व. के दुश्मन बेनाम-ओ-निशान हैं, इन का कोई नामलेवा नहीं है, बल्कि इंसानियत उन के नाम पर शरमाती है। जब कि इस के बरख़िलाफ़ अज़मत ए मुस्तफ़ा स.व. का इज़हार इस तरह हो रहा है कि आप का इस्म मुबारक तमाम नामों का सरताज है, आप के नामलेवा सारी दुनिया में फैले हुए हैं। आप की सीरत ए पाक लिख कर शाये करते हैं, दिन रात मोमीन आप की शान में सलात-ओ-सलाम और नाअतें पढ़ते रहते हैं और माह रबी उल-नूर में ईद मीलाद उन्नबी स.व. जोश-ओ-ख़रोश के साथ मनाते हैं।
अल्लाह ताला अज़मत ए मुस्तफ़ा स.व. और आप के मुक़ाम-ओ-मर्तबा को ज़ाहिर करने के लिए सूरा मुदस्सीर और सूरा नज्म में भी ज़िक्र फ़रमाया है, जिस का मफ़हूम(अर्थ) ये है कि जो क़ुरआन आप सुनाते हैं वो वही इलाही है और एक पाक फ़रिश्ता जिब्रईल अलैहि स्सलाम के ज़रीया नाज़िल की जाती है।
मुफ़स्सिरीन ने लिखा है कि सूरा मुदस्सर की इबतिदाई आयात जिस वक़्त नाज़िल हुईं, उस वक़्त ये वाक़िया पेश आया था। हज़रत जिब्रईल अलैहि स्सलाम को आप स.व. ने उन की असली सूरत में कोह ए हिरा (हीरा पहाडी)के पास मशरिक़ी उफ़ुक़(आकाश) पर देखा था। ये शरफ़ बजाय ख़ुद इमतियाज़ी शान रखता है, क्योंकि दीगर अन्बीया-ए-किराम को ये शरफ़ हासिल नहीं हुआ। फिर सूरा नजम में इरशाद होता है कि वो (नबी स.व.) अपनी ख़ाहिश से कुछ नहीं कहते, इन का कहना तो वही (इलाही) है, जो उन की तरफ़ भेजी जाती है। दरअसल सरदारान ए क़ुरैश वही की सच्चाई को नहीं मानते थे, इस लिए हज़रत जिब्रईल अलैहि स्सलाम की सिफ़ात और कमालात ब्यान किए गए। लिहाज़ा वही के बारे में किसी तरह के शक-ओ-शुबा की गुंजाइश नहीं है, यानी आप का कहना वही इलाही है।
ये अज़मत ए मुस्तफ़ा स.व. की मेराज नहीं तो किया है? कि आप ने बताया कि ये क़ुरआन है तो वो क़ुरआन हुआ और जब आप ने तशरीहन कुछ ब्यान फ़रमाया तो वो हदीस पाक बन गई।

मुफ़स्सिरीन ने लिखा है कि शब ए मेराज में हुज़ूर अकरम स.व. ने हज़रत जिब्रईल अलैहि स्सलाम को सीद्र्तूल मून्तहा के पास दूसरी मर्तबा असली सूरत में देखा। सीद्र्तूल मून्तहा सातवें आसमान पर गोया दोनों आलमों के दरमयान एक सरहदी चौकी है। अहकाम इलाही पहले सीद्र्तूल मून्तहा पर नाज़िल होते हैं, फिर वहां से फ़रिश्ते उन को लेते हैं और हसबे हिदायत इस आलम पर जारी करते हैं। इन हक़ीक़तों को जानने के बाद हमारे दिल-ओ-दिमाग़ में और भी ज़्यादा अज़मत मुस्तफ़ा स.व. बस जाना चाहीए और हमें हमेशा अपने प्यारे आक़ा स.व. पर दरूद-ओ-सलाम का नज़राना पेश करते रहना चाहीए।

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