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आखिर मुस्लिम क़ौम इतनी बड़ी तादाद में अनपढ़ क्यों?

दिल्ली : मुस्लिम क़ौम के बारे में भारत में इतनी रिपोर्ट आ चुकी फिर भी मुस्लिम क़ौम इनसे अंजान बने फिर रहे हैं, चाहे वो सहचर की रिपोर्ट हो या फिर कोई और रिपोर्ट अब खबर आ गई कि भारत में सबसे अधिक अनपढ़ भी मुस्लिम ही हैं. लेकिन क्यों? भारत के मुसलमानों का दीन और दुनिया के बीच जो सामंजस्य बिठाना चाहिए था वह उतना अच्छा नहीं है जितना अन्य देशों में है. शायद उनके पिछड़ेपन की वजह भी यही है. इसीलिए 2011 की जनगणना के जो आंकड़े आ रहे हैं उनमें मुसलमानों के पिछड़ेपन की कहानी कुछ ज्यादा ही नुमायां हो रही है. अभी इस खबर को गुजरे ज्यादा दिन भी नहीं हुए थे कि भारत का हर चौथा भिखारी मुस्लिम है, अब यह खबर आ गई कि भारत में सबसे अधिक अनपढ़ भी मुस्लिम ही हैं. जनगणना के ताजा आंकड़े बताते हैं कि भारत में 42.72 प्रतिशत से अधिक मुसलमान अनपढ़ हैं और सबसे कम निरक्षर सिर्फ 13.57 फीसदी जैन समुदाय के लोग हैं. यह भी अजीब इत्तेफाक है कि सबसे कम पढ़े लिखे और सबसे अधिक पढ़े लिखे, दोनों ही अल्पसंख्यक हैं. देश में 25.7 प्रतिशत जैन समुदाय के लोग ग्रैजुएट हैं जबकि मुसलमानों में इनका फीसद सिर्फ 2.8 है. ईसाइयों में 8.8 फीसदी लोग ग्रैजुएट हैं और सिक्ख 6.4 प्रतिशत ग्रैजुएट हैं.

भारत की आबादी में मुसलमान 14.23 फीसदी हैं जबकि भिखारियों की आबादी में उनकी हिस्सेदारी 24.9 प्रतिशत बनती है. सच्चर आयोग की रिपोर्ट पहले ही बता चुकी है कि भारत में मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर हो चुकी है. प्रसिद्ध लेखक असगर वजाहत ने इस बारे में बड़ा वाजिब सवाल उठाया है. वह कहते हैं कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में मुसलमान अनपढ़ क्यों हैं. उनके अनुसार उत्तर भारत का मुस्लिम समाज विभिन्न धार्मिक मसलकों और मतों में इतना अधिक विभाजित कर दिया गया है कि उनके बीच संवाद की स्थिति ही नहीं बनती. हर मसलक और मत को मानने वाले केवल अपने धर्म गुरुओं की बात सुनते हैं. गुजरात में सबसे अधिक फिरकों और मसलकों में बंटे मुसलमान हैं. वजाहत कहते हैं कि अपवाद हो सकते हैं पर मुस्लिम धर्मगुरु शिक्षा पर बहुत अधिक बल नहीं देते क्योंकि शिक्षा प्राप्त व्यक्ति धर्मांधता से बाहर निकल आता है और मौलवी यह नहीं चाहते हैं कि उनकी पकड़ से उनके अनुयायी बाहर आए क्योंकि उनके मानने वालों की जितनी अधिक संख्या होती है वे चुनाव की राजनीति में उतना अधिक मोलतोल करते हैं.

एक बड़ा सवाल यह भी है कि शिक्षित मुस्लिम मध्यमवर्ग मुसलमानों की शिक्षा का कोई बड़ा कार्यक्रम क्यों नहीं चलाता है. असगर वजाहत कहते हैं कि आजादी के बाद जन्मी यह पहली मुस्लिम पीढ़ी है जो मध्यम वर्ग बनी है. नए मध्यम वर्ग बनने के कारण उसके अंदर एक प्रकार का आत्मसंतोष और स्वार्थ पैदा हो गया है. वह दूसरों की चिंता किए बगैर आत्मकेंद्रित हो गई है. दूसरी तरफ मुस्लिम व्यापारी वर्ग प्रायः धन कमाने और धन के प्रदर्शन पर विश्वास करता है. ऐसी स्थिति में मुस्लिम समाज में शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने का काम बहुत कठिन हो गया है. लेकिन यह भी सही है कि कुछ समय बाद यही वर्ग समाज को दिशा देने का काम करेगा. हालांकि कि कुछ लोग और संस्थाएं इस दिशा में काम कर रही हैं, पर उनका काम काफी नहीं है. यह स्थिति उत्तर भारत के मुसलमानों की है इसमें दक्षिण भारत के मुसलमानों को शामिल नहीं किया जा सकता है यह बात सभी को पता है कि ऐतिहासिक कारणों से उत्तर और दक्षिण भारत के मुसलमानो में बहुत सामाजिक अंतर है, धार्मिक भी और सामाजिक भी.
समाजशास्त्री प्रोफेसर राजेश मिश्र इस बात को दूसरे ढंग से कहते हैं कि उनके बीच चलाए जा रहे अधिकांश कार्यक्रम मजहबी चोले से बाहर नहीं आ पा रहे हैं. हो भी रहा है तो मदरसों का आधुनिकीकरण. आधुनिक शिक्षा के लिए मुस्लिम इलाकों में जो काम होना चाहिए वह नहीं हो पा रहा है और यह काम मुसलमानों के सहयोग के बिना मुमकिन भी नहीं है.

लखनऊ के प्रसिद्ध समाजसेवी तारिक सिद्दीकी कहते हैं कि मुसलमानों की तालीम का काम बड़े पैमाने पर मुस्लिम संस्थाएं शुरु करती हैं लेकिन कुछ समय बाद वह संस्थाएं धार्मिक कामों में ज्यादा दिलचस्पी दिखाने लगती हैं. जाहिर है कि उन पर सामाजिक दबाव काम करता है. हालांकि वह यह भी कहते हैं कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, जौहर यूनिवर्सिटी और इसी तरह की दूसरी मुस्लिम शैक्षिक संस्थाओं में जाकर इस बात का अहसास होता है कि मुसलमानों में शैक्षिक रुझान बहुत तेजी से बढ़ रहा है. हां, यह काम अभी पिछले दस पंद्रह वर्षों में ही शुरू हुआ है तो इसके नतीजे भी दस पंद्रह साल के बाद दिखने लगेंगे.

ब्लॉगः एस. वहीद

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