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आजादी के 70 साल, लेकिन रूढ़िवादी सोच की आज भी गुलाम है महिलाएं!!

आज़ादी।
लोग कह रहे हैं 70 साल पूरे हो चुके हैं आज़ादी मिली को, ख़ुशी की बात है क्योंकि हमारे पूर्वजों ने अपनी जान की कुर्बानियां दी हैं इस देश को आज़ाद करवाने के लिए। जिसका कर्ज हम कुछ भी कर ले फिर भी कभी नही चुका पाएंगे। सुबह उठी तो एक मैसेज आया मुझे “हैप्पी इंडिपेंडेंस डे” का। मेरे दिमाग में छवि आई उन सभी क्रांतिकारियों की जिनकी बदौलत देश आज 70वा आजादी दिवस मना रहा है। मुझे भी गर्व हुआ कि मैं एक आज़ाद देश में जी रही हूँ। जहाँ मैं खुलकर जी सकती हूँ!! ये थी मेरे दिमाग की एकतरफ सोच। एक दम ही दिमाग की दूसरी तरफ से सवाल आया क्या मैं सच मैं आजाद हूँ? इस दूसरी तरफ ने मुझे जंझोड़ के रख दिया जब बोली कि जब पैदा होते ही एक लड़की की जंग शुरू हो जाए और मरते दम तक भी खत्म न हो पाए कभी बेटी,बहन, फिर पत्नी और माँ। कहाँ हैं मेरी आजादी? माँ की कोख में बाप,दादा से लड़ी पैदा होने के लिए और कभी-कभी तो खुद की माँ से भी लड़ना पद जाता है इस दुनिया में जन्म लेने के लिए। पैदा हो ही गई तो बचपन से बैगाने घर का डर देकर मुझे हमेशा डराया गया। मन में शादी की बोझ लिए अपने ही घर में बैगानों की तरह में रहती हूँ ये सोचकर शायद वहां जाकर मुझे मेरी आजादी मिल जाए। पढ़ाने के लिए मुझे क्यों नही स्कूल भेज जाता जबकि मेरा भाई तो रोज स्कूल जाता है। पढ़-लिख कर मैं भी अफसर बनूँगी अगर स्कूल जाउंगी। लेकिन स्कूल जायूँ  कैसे? रोज सुबह जब भाई को देखती हूँ तो मानो एक सपना खुली आँखों से देखती हूँ। मेरी पढाई, मेरे कपडे, मेरा घूमना फिरना, सही वक़्त, हमेशा मेरे घरवाले ही तय करते है। आज़ादी ? हमेशा मुझे इज्जत का डरावा दिया जाता है कि घर में रहोगी तो ही ठीक है बाहर का माहौल तुम्हारे लिए सही नहीं। आज़ादी ? यूं जिंदगी के सफर का हर कदम मैं खुद नही कोई और ही तय करता है तो मैं क्या करती हूँ ? एक घर से दूसरा घर बदल गया मैं लड़ती रही अपनी मौलिक अधिकारों के लिए लेकिन नही। नहीं मिल पायी मुझे ये आजादी। आज इतना डर चुकी हूँ मैं कि अपने विचार किसी को क्या खुद को ही बताने से कतराती हूँ। लिखूं तो शायद खत्म न कर पाऊँगी। लेकिन दिमाग चिल्ला-चिल्ला कर पूछ रहा है कि देश तो गया आजाद। क्या कभी मैं हो पाऊँगी? मैं अपनी आजादी का झंडा कब लहर पाऊँगी? क्या मुमकिन है ये की मैं भी कह पायूँ :मुझे भी आजादी मुबारक
हमारे देश के पूर्वजों ने तो आजादी दिला दी हमें लेकिन आगे की पीढ़ियां  अपनी सोच को आजाद क्यों  नहीं कर पा रही। क्यों हो रहा है भेदभाव, क्यों लड़की को कोख में मार दिया जाता है ? क्यों देश में महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पाती?

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