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आजादी के 71 साल बाद भी दोराहे पर मुस्लिम, मेनस्ट्रीम में आने की जद्दोजहद जारी

आज़ादी के सत्तर साल के बाद भी मुस्लिम समाज विकास की ड्योढ़ी से कोसो दूर है. टू-नेशन थ्योरी को रिजेक्ट करने वाले मुसलमान आज भी समाज में मेनस्ट्रीम में आने की जद्दोजहद कर रहें हैं. लेकिन इन सत्तर साल में मुस्लिम सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गया है. जिस समाज की ज़रूरत आम आदमी के मसाइल से मिलता जुलता है. लेकिन मुस्लिम के मसले हमेशा पेंचीदा बने हुए है. सत्तर साल के बाद मुस्लिम ट्रिपल तलाक और निकाह हलाला जैसे मसले पर उलझा हुआ है. उसको नए सिरे से घेरने की कोशिश होती है. जो जाल उस पर फेंका जाता है. उससे वो निकल नहीं पाता है. हालांकि मुस्लिम समाज की सबसे बड़ी ज़रूरत रोटी कपड़ा के बाद शिक्षा की है. सच्चर कमेटी ने मुसलमानों की हालत दलित से ज्यादा चिंता जनक बताई है.हालांकि आज़ाद भारत में पहली बार मुस्लिम ज्यादा असुरक्षित महसूस कर रहा है.

70 साल बाद भी असुरक्षित महसूस कर रहे हैं मुसलमान

आज़ादी के सत्तर साल के बाद भी मुस्लिम समाज डर में जी रहा है. शहरी आबादी में मुस्लिम घेट्टो बनते जा रहें हैं. एक एनजीओ के डॉटा के मुताबिक मार्च 2017 से अब तक मॉब लिंचिंग की 77 घटनाएं हो चुकी है. जिसमें मरने वाले ज्यादातर मुसलमान है. मॉब लिंचिंग अल्पसंख्यक के खिलाफ नए हथियार के तौर पर उभरा है. गाय को लेकर हो रही हिंसा का शिकार भी ज्यादातर मुसलमान है. जिसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रूख अख्तियार किया है.

 

फिलहाल जिस तरह का माहौल बन गया है, उससे मुस्लिम समाज में डर है. खासकर ऐसी जगह जहां मुसलमान मिश्रित आबादी में रहता है. इस धार्मिक असुरक्षा को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म है. लेकिन फिलहाल अपने को सेक्युलर दल कहने वाली कई पार्टियां मुसलमान से उचित दूरी बनाए रखना चाहती है. जो लोग मुसलमानों की तरफ दारी करते हुए पार्टी में दिखाई देते हैं वो हाशिए पर ढकेल दिए जा रहें हैं.

मुसलमान को अपनी देश भक्ति बार-बार साबित करने के लिए बाध्य किया जा रहा है. आरोप वर्तमान निज़ाम पर हैं, कि वो ऐसे संगठनों को प्रश्रय दे रहें हैं जो मुसलमानों के खिलाफ अभियान चला रहें हैं. कह सकते हैं कि दुष्प्रचार भी चरम पर है. ट्रिपल तलाक से लेकर हलाला पर मुसलमान जवाब देता दिखाई दे रहा है.

जबकि बहुत सारे मुसलमानों को हलाला के बारे में, मुतह, निकाह मिसयार के बारे में रत्ती भर जानकारी नहीं है. पर्सनल लॉ का मुद्दा सार्वजनिक मुद्दे में तब्दील हो गया है. हर मुसलमान को सवालिया नज़रो से देखा जा रहा है. हालांकि बाकी तबको की तरह रोटी कपड़ा मकान एक बड़ा मसला है.

गरीबी और अशिक्षा मुस्लिमों के विकास में बन रहे रुकावट 

सबसे बड़ा मसला गरीबी का है.सच्चर कमेटी के मुताबिक 31 फीसदी मुसलमान गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहें हैं.नेशनल काउंसिल फॉर अप्लाइड एकॉनामिक्स के रिसर्च के मुताबिक दस में से तीन व्यक्ति गरीब है. जिसका महीने का खर्च 550 रुपए है. वहीं ग्रामीण इलाके में ये और कम यानि सिर्फ 338 प्रतिमाह है. पीइडब्लू के सर्वे के मुताबिक मुस्लिम 32.7 रुपए प्रतिदिन खर्च कर पाते हैं. जबकि एनएसएसओ के सर्वे के मुताबिक शहरी इलाके में मुस्लिम समाज में प्रति व्यक्ति का खर्च राष्ट्रीय औसत से काफी कम है. मुस्लिम समाज की गरीबी कम होने का नाम नहीं ले रही है.

मुसलमानों के बदतर जिदगी को सुधारने का कोई ठोस पहल नहीं किया गया है. जो भी पहल है वो काग़ज़ तक सीमित है. एक ज़माने में गंदी गलियां और टाट के पर्दे मुस्लिम मोहल्ले की पहचान होती थी लेकिन आज़ादी के इतने साल के बाद भी हालात में ज्यादा बदलाव नहीं दिखाई दे रहा है.

मुसलमानों के गरीब होने की वजह से उच्च शिक्षा का स्तर निम्न है. वहीं ड्राप आउट की तादाद काफी ज्यादा है. शिक्षा का आलम ये है कि 20 फीसदी बच्चे चौदह साल तक पहुंचते स्कूल छोड़ देते है. किंग अब्दुल अज़ीज़ यूनिवर्सिटी जेद्दा के इंतखाब आलम खान के मुताबिक लिट्रेसी रेट का स्तर 60 फीसदी है.जो औसत से कम है. मुस्लिम महिला में ये 50 फीसदी है.वही ग्रामीण हलके में 40 फीसदी है. जिसका कारण है भूमिहीन होना, 35 फीसदी मुस्लिम मज़दूर भूमिहीन है. जो और लोगों के मुकाबले काफी कम है. ज़ाहिर है कि इससे साबित होता है कि शिक्षा का स्तर गरीबी की वजह से गिर रहा है.

गरीब परिवेश में रहने वाले बच्चे बचपन से ही कमाने में मां बांप की सहायता करने लगते है. जिसके कारण स्कूल नहीं जा पाते हैं. जो पढ़ लेते हैं वो गरीबी की वजह से आगे पढ़ाई नहीं कर पाते हैं. इसलिए 100 में से सिर्फ 11 बच्चे उच्च शिक्षा तक पहुंच पाते हैं. सच्चर कमेटी ने मुस्लिम बहुल्य जिलों में आवासीय विद्यालय खोलने की सिफारिश की थी लेकिन इस पर कोई काम आगे नहीं बढ़ पाया है.

इसमें सरकार की ओर से उदासीन रवैया है. लेकिन मुस्लिम तंज़ीमें कम ज़िम्मेदार नहीं है. जिन्होंने मुस्लिम समाज की इस कमीं को दूर करने के लिए कोई संजीदा प्रयास नहीं किया है. मदरसा सिस्टम पर ज़ोर दिया लेकिन मदरसों को आधुनिक शिक्षा से दूर रखा गया है. ज़ाहिर इस वजह से मुसलमान तालीम में पिछड़ गया है.

रोज़गार के मसले भी हैं

मुसलमानों के अनपढ़ रह जाने की वजह ये भी है. रोज़गार के अवसर ना के बराबर है. संगठित क्षेत्र में रोज़गार के अवसर काफी कम है. मुसलमानों की तादाद सरकारी नौकरियों में कम हो रही है .आलम ये है कि आईएएस में 3 फीसदी हिस्सेदारी मुसलमानों की है. इस तरह रेलवे में 4.5 फीसदी तो पुलिस में सिर्फ़ 6 फीसदी है. ज़ाहिर है कि सरकारी नौकरी ना मिलने की वजह से मुसलमानों में पढ़ने की ललक कम हुई है. ये गिरावट एक दिन में नहीं आई है. बल्कि सतत् चल रहा है. किसी सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया है. सरकारी वर्कफोर्स के आंकड़े बता रहें हैं कि मुस्लिम की भागीदारी 32 फीसदी है. जो औसत से दस फीसदी से ज़्यादा कम है. इसका कारण भी समझ आ रहा है. कई लोग राजनीतिक कारण गिनाते है.

राजनीति में भागीदारी भी न के बराबर

2014 में मोदी लहर की वजह से सबसे कम तादाद में मुस्लिम लोकसभा का मुंह देख पाए है. ऐसा नहीं है इससे पहले सरकार में मुसलमानों की भागीदारी बहुत ज्यादा थी. वर्तमान सरकार में जो बीजेपी की अगुवाई में चल रही है. दो मुस्लिम मंत्री हैं. यूपीए दो में भी तादाद ज्यादा नहीं थी. .यूपीए के पहले कार्यकाल में ज़रूर मुस्लिम नुमाइंदगी बढ़ी थी लेकिन उसका कारण रीजनल पार्टियां थी. मसलन आरजेडी या छोटे दल, ज़ाहिर है इसलिए उत्तर भारत में मुसलमान नेशनल पार्टियों की जगह क्षेत्रीय दलों को तरजीह दे रहा है. लेकिन इसकी वजह से मुसलमान को राजनीति में भागीदारी नहीं मिल पा रही है. बल्कि वो वोट बैंक की तरह इस्तेमाल हो रहा है.

मुसलमान को राजनीतिक ताकत पाने के लिए वोट बैंक वाले कैटेगरी से बाहर आना पड़ेगा. राजनीति में अपने मसले पर वोट करने की परंपरा शुरू करने पड़ेगी. राजनीतिक छलावा या संवेदनशील मुद्दों के हिसाब से वोट करने की जो आदत है, उससे बाज़ आना होगा. यही वहीं कई ऐसे मुद्दे है, जो मुसलमानों के खिलाफ हथियार बने हुए है. उसको खुद आगे आकर खत्म करना होगा, जैसे आबादी का मुद्दा है. इस पर मुसलमानों को राय मशविरा करके एक धारा पर आगे बढ़ना चाहिए. जिससे ऐसे मुद्दे समाप्त हो जाए. ट्रिपल तलाक का मसला शाहबानो के मुद्दों के साथ खत्म हो गया होता तो आज इस फजीहत से बच सकते थे.

 

सय्यद मोइज़ इमाम

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

साभार- फर्स्ट पोस्ट

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