Wednesday , September 26 2018

आधार करोड़ों लोगों के जीवन के अधिकार को दुर्बल करता है!

21 मार्च 2018 को सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में आधार के पक्ष में अपने दावे देने शुरू किए. रोज़ी रोटी अधिकार अभियान निराश है कि सरकार एक बार फिर जन योजनाओं में आधार के फायदों के खारिज किए गए दावों को पेश कर रही है.

आधार से जन योजनाओं के लाभार्थियों को चिन्हित नहीं किया जा सकता

अटर्नी जेनरल का यह दावा है कि आधार से जन योजनाओं के सही लाभार्थियों को चिन्हित किया जा सकता है. इन योजनाओं की पात्रताएं गरीबी, उम्र, लिंग, जाति व वैवाहिक स्थिति जैसे निर्धारकों पर आधारित है. आधार लोगों को केवल एक संख्या प्रदान करता है, जिससे किसी एक प्रकार के लोगों या परिवारों को चिन्हित करना संभव नहीं है.

आधार से लोगो का सशक्तिकरण नहीं हुआ है

आधार से इसका ठीक विपरीत हुआ है – लोग अपने अधिकारों से वंचित हो रहे हैं और उनको कई प्रकार की कठिनाइयां सहनी पड़ रही है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जन वितरण प्रणाली में आधार की अनिवार्यता लागू होने के बाद राजस्थान के 33 लाख परिवार राशन दुकान से अनाज नहीं ले पाए. इस ही प्रकार, झारखंड में प्रति महीना 25 लाख परिवार राशन के अधिकार से वंचित हो रहे हैं. दिल्ली की जन वितरण प्रणाली में आधार-आधारित बायोमेट्रिक सत्यापन (ABBA) के कारण जनवरी 2018 में लगभग एक चौथाई राशन कार्डधारी अनाज नहीं ले पाए. जुलाई 2017 से जनवरी 2018 के बीच आधार के कारण योजनाओं से वंचित होने के कारण तीन राज्यों के बीच कम से कम 10 लोगों की भूख से मौत हुई है.

आधार से भ्रष्टाचार कम नहीं हुआ है

जन योजनाओं में आधार की अनिवार्यता के कारण बल्कि कई नए प्रकार के भ्रष्टाचार उत्पन्न हुए हैं. कई लोगों को आधार में नामांकित होने, उसमें अपनी जानकारी बदलवाने, उसे सुविधाओं के साथ जोड़ने जैसी प्रक्रियाओं के लिए बिचौलियों व अन्य लोगों को घूस देनी पड़ती है.

आधार से बस यह रुक सकता है कि एक व्यक्ति कोई सुविधा पाने के लिए कोई अन्य व्यक्ति होने का दावा करे. परन्तु, योजनाओं में अधिकाँश चोरी लाभार्थियों को उनके अधिकार की तुलना कम मात्रा या/और गुणवत्ता की सुविधा देने से होती है. इस प्रकार की चोरी कम करने में आधार असमर्थ है. यह झारखंड में 900 परिवारों के एक सर्वेक्षण से स्थापित हुआ, जिसमें यह पता चला कि जिन गाँवों में ABBA द्वारा राशन दिया जा रहा था और जिनमें ABBA के बिना, इन दोनों में कार्डधारियों को सामान मात्रा में चावल मिल रहा था. कार्तिक मुरलीधरन, संदीप सुखतंकर और पॉल निएहौस (कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो और वर्जिनिया विश्वदियालय) के निष्कर्ण भी इस ही प्रकार के हैं.

आधार से सालाना 57,000 करोड़ रुपये की बचत नहीं हो रही है

इस दावे को बार बार खारिज किया गया है. इसके विश्लेषण से पता चलता है कि सरकार इस बचत के कारण या इसकी गणना की प्रणाली नहीं बता रही है. इस आंकड़े (11 बिलियन डॉलर) का मूल स्त्रोत विश्व बैंक की 2016 की एक रिपोर्ट है. 57,000 करोड़ रुपये असल में भारत सरकार का “मुख्य नकद हस्तांतरण योजनाओं” पर सालाना खर्च का आंकडा है. जब इसके बारे में विश्व बैंक को टोका गया, तो उसने जन कल्याणकारी योजनाओं पर केंद्र सरकार के सालाना खर्च को बढ़ा-चढ़ाकर 70-100 बिलियन डॉलर बताया और दो योजनाओं में आधार के कारण हुई कथित बचत के दर के अनुसार अनुमान लगाया कि आधार से सालाना कुल 8-14 बिलियन डॉलर की बचत हो सकती है – एक आंकड़ा जो 11 बिलियन डॉलर के आस पास का है!

जन योजनाओं में आधार की अनिवार्यता जीने के अधिकार पर एक प्रहार है. रोज़ी रोटी अधिकार अभियान सर्वोच्च न्यायालय से आग्रह करता है कि सामाजिक और आर्थिक अधिकारों में आधार की अनिवार्यता तुरंत समाप्त हो.

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