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आमाल की असल रूह तक़वा है

अल्लाह तआला का इरशाद है कि ग़ज़वा ए बदर में उसने तुम्हारी मदद की, हालाँकि तुम दुश्मन के मुक़ाबिल में बेहक़ीक़त थे। पस ख़ुदा से डरो और उसकी शुक्रगुज़ारी करो (आल-ए-इमरान।१२३)

अल्लाह तआला का इरशाद है कि ग़ज़वा ए बदर में उसने तुम्हारी मदद की, हालाँकि तुम दुश्मन के मुक़ाबिल में बेहक़ीक़त थे। पस ख़ुदा से डरो और उसकी शुक्रगुज़ारी करो (आल-ए-इमरान।१२३)

इस आयत से मालूम हुआ कि शुक्र की बुनियाद तक़वा है और ईमान की बुनियाद शुक्र पर है। या यूं कहा जाये कि ईमान जज़बा ए शुक्र के इज़हार का नाम है, यानी तक़वा दर्जा में ईमान और शुक्र दोनों से मुक़द्दम है।

इरशाद फ़रमाया ऐ ईमान वालो! अल्लाह के लिए अदल के साथ गवाही देने को आमादा रहो और लोगों की अदावत तुम्हें इस बात पर ना उभारे कि तुम अदल से हट जा। अदल करो, इसलिए कि यही तक़वा से क़रीब है और ख़ुदा से डरते रहो, क्योंकि ख़ुदा तुम्हारे आमाल से बाख़बर है (अलमायदा: ८) इस आयत से मालूम हुआ कि हमारे दीन के तमाम आमाल की असल रूह तक़वा है और इस्लाम के फ़र्ज़ इबादात का मक़सद ही इस रूह तक़वा का पैदा करना है।

रोज़ा की भी यही ग़ायत है, चुनांचे इरशाद होता है: मुसलमानो! तुम पर भी रोज़े इसी तरह फ़र्ज़ किए गए, जैसे तुम से पहले वालों पर फ़र्ज़ किए गए थे, ताकि तुम में तक़वा पैदा हो। (अलबक़रा।१८३)

क़ुर्बानी में भी यही रूह (तक़्वाकार फ़र्मा होनी चाहीए। चुनांचे इरशाद फ़रमाया: ना तो ख़ुदा को इसका ख़ून पहुंचेगा और ना गोश्त, बल्कि उसे तुम्हारा तक़वा पहुंचेगा। (सूरा अल-हज।३७)

क़ौम बनी इसराईल को तौरात देने का असल मक़सद तक़वा पैदा करना बताया गया है। चुनांचे इरशाद फ़रमाया: याद रखो! जबकि हम ने तुम से इक़रार लिया और तूर को तुम्हारे ऊपर लटकाया और कहा जो कुछ हमने तुमको दिया है, उसे मज़बूती से पकड़ लो और इसमें जो कुछ है उसे याद रखो, ताकि तुम में तक़वा पैदा हो। (अलबक़रा।६३)

वाज़िह रहे कि तक़वा वालों की शनाख़्त ये है कि जब भी कोई शैतानी ख़्याल उनके क़रीब होता है, फ़ौरन मुतनब्बा हो जाते हैं और इसी दम बचाव का रास्ता देख लेते हैं। यानी अल्लाह तआला के मुत्तक़ी बंदे हर आन बेदार रहते हैं, उन पर ग़फ़लत-ओ-निसियाँ नहीं तारी होता और अगर कभी शैतानी छूत लग जाती है तो फ़ौरन ख़ुदा की तरफ़ मुतवज्जा हो जाते हैं और भटकते हुए क़दम राह ए रास्त पर आ जाते हैं।

अहल तक़वा के लिए फ़रमाया गया है कि जो ख़ुशहाली और तंगदस्ती में ख़र्च करते हैं, ग़ुस्सा को रोकते हैं और लोगों से दरगुज़र करते हैं। नेकोकारों को ख़ुदा महबूब रखता है और वो लोग जब कोई बुराई का काम कर बैठते हैं या अपने ऊपर ज़ुल्म कर जाते हैं तो ख़ुदा को याद करके अपने गुनाहों की माफ़ी चाहते हैं और ख़ुदा के सिवा गुनाहों का माफ़ करने वाला है ही कौन? यानी अपनी लग़ज़िशों पर दीदा-ओ-दानिस्ता हट नहीं करते।

हक़ीक़ी मानी में मुत्तक़ी वही हैं जो सच्चाई की तसदीक़ करते हैं और हर इस दावत पर लब्बैक कहने के लिए तैयार रहते हैं जिसकी बुनियाद हक़-ओ-सदाक़त पर हो।

तक़वा का ताल्लुक़ क़लब से है और इसका सरचश्मा फ़िक्र-ओ-नज़र है। यानी इंसान जब इस कायनात पर नज़र डालता है और उस की हिक़मतों पर ग़ौर करता है तो उसको नज़र आ जाता है कि ये दुनिया जिसका ज़र्रा ज़र्रा हिक्मत और परवरदिगारी की एक ज़िंदा शहादत है, बेकार नहीं पैदा की है।

इसका अंजाम और नतीजा एक दिन हमारे सामने ज़रूर आएगा और उसी दिन वो लोग यक़ीनन तबाही में पड़े रहेंगे, जिन्होंने इस भेद को ना समझा और सारी ज़िंदगी नफ्स परवरी और ऐश-ओ-इशरत की सर मस्तियों में गुज़ार दी।

बारगाह ए इलाही में मुत्तक़ियों का जो दर्जा है, क़ुरान-ए-पाक में मुतअद्दिद जगह इसका ज़िक्र किया गया है। जो लोग ख़ुदा से डरते हैं, उनके लिए ऐसे बाग़ात होंगे, जिनके नीचे नहरें जारी होंगी, इनमें वो हमेशा रहेंगे। ये ख़ुदा की तरफ़ से नेकोकारों के लिए इससे कहीं बेहतर है। (आल-ए-इमरान।१९८)

जिन लोगों ने तक़वा इख़तियार किया, उनके लिए पाक बीवीयां होंगी और ख़ुदा की ख़ुशनूदी और ख़ुदा (अपने) बंदों के अहवाल से ख़ूब वाक़िफ़ है। अहल तक़वा के रुतबा की बाबत जो आयात ऊपर नक़ल की गई हैं, उनसे ज़ाहिर है कि बारगाह ए इलाही में असल इज़्ज़त और सुर्ख़रूई इन्ही लोगों को मिलेगी, जिन्होंने दुनिया में बेलगाम होकर ज़िंदगी नहीं बसर की, बल्कि अपनी ज़िंदगी हुदूद तक़वा के अंदर गुज़ारी और कभी भी तक़वा की हुदूद से बाहर क़दम नहीं निकाला।

अहल तक़वा की कामयाबी का ज़हूर तो क़ियामत में होगा, जिस दिन उनकी कामयाबी में कोई दूसरा शरीक ना होगा, लेकिन इस दुनियावी ज़िंदगी की मनाज़िल में भी वो ख़ुदा की ताईद से महरूम नहीं होंगे।

—-(बिलकीस मुईन उद्दीन)

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