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आर टी सी बसों में चिल्लर और पाँच की नोट को लेकर मुसाफ़िरॊ से बेहस व तकरार रोज़ का मामूल

हैदराबाद २‍१ फरवरी(सियासत न्यूज़) अवामी सहूलयात के नाम पर पिछले साल शहर भर में बहुत सारे नए आरटीसी बसों में इज़ाफ़ा किया गया जिस से मुसाफ़िरॊ को काफ़ी सहूलत हुई है मगर हालिया कुछ अर्से से बस कंडक्टरों की मुसाफ़िरॊ के साथ बदसुलूकी

हैदराबाद २‍१ फरवरी(सियासत न्यूज़) अवामी सहूलयात के नाम पर पिछले साल शहर भर में बहुत सारे नए आरटीसी बसों में इज़ाफ़ा किया गया जिस से मुसाफ़िरॊ को काफ़ी सहूलत हुई है मगर हालिया कुछ अर्से से बस कंडक्टरों की मुसाफ़िरॊ के साथ बदसुलूकीऔर थोड़ी थोड़ी बात पर बहत व तकरार ने आरटीसी के तईं मुसाफ़िर यन मैं बदज़नी बढ़ती जा रही है जिस पर मुताल्लिक़ा ओहदेदारों को फ़ौरी तवज्जा देने की ज़रर वित्त है।

इत्तिला के मुताबिक़ मुसाफ़िर यन के साथ सब से ज़्यादा बेहस वतकरार चिल्लर पीसी को लेकर होती रहती है ।बताया जाता है कि अगर किराया चार पाँच रुपय है और मुसाफ़िर यन की जानिब से दस का भी नोट दिया जाय तो बस कंडक्टर स की अक्सरीयत उसे लेने से इनकार कर देती है और उसकी जगह चिल्लर पैसे देने की ज़िद‌ की जाती ही,कि मुसाफ़िरॊ के पास चिल्लर पैसे मौजूद ना होने की वजह से बसाऔक़ात बस से उतार देने के भी वाक़ियात पेश आ रहे हैं जिस से बस मुसाफ़िरॊ को काफ़ी शर्मिंदगी और ज़हनी अज़ीयत का सामना करना पड़ रहा है।

गुज़शता रोज़ मह्दी पटनम से चारमीनार जाने वाली बस में अब्दुल् अलीम‌ नामी एक शख़्स को कंडक्टर ने महिज़ इस वजह से बस से उतर ने पर मजबूर करदिया कि उनके पास पच्चास और पाँच पाँच के नोट थे , जिसे मुताल्लिक़ा कंडक्टर ने लेने से ये कहते हुए इनकार कर दिया कि अब पाँच रुपय के नोट बन्द‌ हो चुके हैं ,थोड़ी देर बेहस-ओ-तकरार के बाद कुंड यकर ने साफ़ तौर प्राण से कह दिया कि नौ रुपय चिल्लर है तो दो वर्ना बस से उतर जाओ यहां तक कि मानसाब टैंक के पास उन्हें बस से उतरने पर मजबूर कर दिया गया ।

हालाँकि दूसरे मुसाफ़िरों की जानिब से ये वज़ाहत करने के बावजूद कि पाँच के नोट का चलन बरक़रार है और इस हवाले से अख़बारात में ऐलानात आ चुके हैं ,कंडक्टर का कहना था दूसरे मुसाफ़िर यन को पाँच का नोट देने पर वो लेने से इनकार करदेते हैं तो मैं क्यों लूं?बस मुसाफ़िर यन के मुताबिक़ अगर बीस रुपय का नोट भी कंडक्टर के हवाले किया जाय तो वो टिकट पर माबक़ी पैसे लिख कर मुसाफ़िर यन के हवाले कर दिया जाता है ,जिस से अक्सर औक़ात ऐसा होता है कि मुसाफ़िर अपनी मंज़िलपर पहुंचने पर जल्द बाज़ी मेंअपने बक़ीया पैसे वापिस लिए बगै़र ही बस से उतर जाते हैं जो कि सीधा कंडक्टर स की जेब में चला जाता है ।इसी लिए बताया जाता है कि कंडक्टरों की अक्सरीयत चिल्लर रहते हुए चिल्लर ना होने का बहाना करके टिकट पर बकाया पैसे लिख कर मुसाफ़िर खुद याद दिलातॆ हैं।

जबकि कंडक्टरस का कहना है कि सुबह में जब वो अपनी डयूटी पर रुजू होने डिपो पहुंचते हैं तो हर कंडक्टर को सिर्फ पच्चास रुपय हवाले किए जाते हैं वो भी उमूमन दस या पच्चास की नोट की शक्ल में , जिस से उन्हें मुसाफ़िरयन को ज़रूरत के मुताबिक़ चिल्लर पैसे वापिस करने में काफ़ी दुशवारीयों का सामना करना पड़ता हैं।

सवाल ये है कि चिल्लर की इस क़दर क़िल्लत है तो मुताल्लिक़ा ओहदेदार बैंक से रुजू होकर इस मसले कोहल क्यों नहीं करती?चूँकि आर टी सी बसों में चिल्लर पैसे के लिए मुसाफ़िरॊ से इस तरह बरताओ की वजह से लोग मजबूर न आटो का सहार लेने पर मजबूर हो जाते हैं जोकि काफ़ी महंगा साबित होता है लिहाज़ा मुसाफ़िर यन का मुतालिबा है कि मुताल्लिक़ा ओहदेदार इस जानिब तवज्जा देते हुए फ़ौरी तौर पर इस मसले को हल करें ताकि मुसाफ़िर यन की सहूलत के साथ आड़टी सी मुसाफ़िर यन की तादाद में भी इज़ाफ़ा होसके

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