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आलमी सतह पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ साज़िशों का बेहतर जवाब हुस्ने अमल के ज़रीये मुम्किन

हैदराबाद 13 दिसंबर: क़ौमी-ओ-बैन-उल-अक़वामी सतह पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ जारी साज़िशों का बेहतर जवाब सिर्फ अमल के ज़रीये दिया जा सकता है।

आज़ाद हिन्दुस्तान की तारीख़ में कभी इस तरह का माहौल पैदा नहीं हुआ था जो फ़िलहाल हिन्दुस्तान का माहौल बना हुआ है। हिन्दुस्तान में अदम तहम्मुल की सूरते हाल पर गहिरी तशवीश का इज़हार करते हुए मुख़्तलिफ़ मकातिब फ़िक्र से ताल्लुक़ रखने वाले उल्मा , सियासी क़ाइदीन और दानिश्वराने मिल्लत ने मुल्क के हालात में तबदीली के लिए मुत्तहिदा जद्द-ओ-जहद की ज़रूरत पर-ज़ोर दिया।

जमात-ए-इस्लामी हिंद की तरफ से मुनाक़िदा चार रोज़ा इजतेमा के दूसरे दिन मुनाक़िद किए गए जल्सा-ए-आम बउनवान हिन्दुस्तान की ताअमीरे नौ और हमसे ख़िताब करते हुए ज़िम्मेदारान मिल्लत-ए-इस्लामीया ने मुल्क को फ़िर्कावारीयत-ओ-फ़सताईयत से पाक करने की ज़रूरत पर-ज़ोर दिया।

मौलाना सिराज उल-हसन साबिक़ अमीर जमात ने बताया के मुल्क की तरक़्क़ी की ज़िम्मेदारी हर फ़र्द पर आइद होती है। उन्होंने कहा के हिन्दुस्तान में बसने वाले हर बाशिंदे का ये मुल्क है और इस की तरक़्क़ी की ज़िम्मेदारी हर हिन्दुस्तानी पर है। लेकिन मुसलमानों की इस पर ज़्यादा ज़िम्मेदारी इसलिए हैके हम ख़ैर उम्मत में से हैं।

उन्होंने बताया कि मिल्लत-ए-इस्लामीया के फ़र्द की हैसियत से हमें ज़िम्मेदारी को महसूस करने की ज़रूरत है चूँकि मुल्क की तरक़्क़ी में किरदार अदा करना एक अज़ीम काम है।मौलाना सय्यद जलालुद्दीन अंसर अमरीकी ज़ेरे सदारत मुनाक़िदा इस जल्सा-ए-आम से मुहम्मद अदीब साबिक़ रुकने पार्लियामेंट ने कहा कि मुल्क में मौजूदा सूरत-ए-हाल इंतेहाई तशवीशनाक हो चुकी है। उन्होंने जवाहर लाल नेहरू के दौर में पटना में हुए फ़सादाद का तज़किरा करते हुए कहा कि जब मुसलमानों को नुक़्सान पहुँचा तो उस वक़्त एवान में मौलाना हिफ़्ज़ अलरहमन ने ये कहा था के मुझे इस बात पर बहुत ज़्यादा अफ़सोस हो रहा है के मैंने ये समझा था आज़ादी हिंद के बाद अगर मुसलमानों को कुछ होता है तो एसे में नेहरू हमारे लिए आवाज़ उठाते लेकिन इस मसले पर हमें ही नुमाइंदगी करनी पड़ रही है।

साबिक़ रुकने पार्लियामेंट मुहम्मद अदीब ने मुल्क की मौजूदा सूरत-ए-हाल को अफ़सोसनाक क़रार देते हुए कहा कि मौजूदा सूरत-ए-हाल के बड़ी हद तक ज़िम्मेदार ख़ुद हम भी हैं चूँकि हमने मुकम्मिल दीन को नहीं समझा बल्कि हम इबादतों को दीन समझ बैठें हैं जब के मुबल्लग़ीन ने बहैसीयत ताजिर , बहैसीयत सय्याह और दुसरे शोबा-ए-हयात में अपनी दियानतदारी-ओ-हक़गोई के अलावा सदाक़त की बुनियाद पर दीन का पैग़ाम आम किया था। उन्होंने अमन-ओ-अमान के क़ियाम के लिए एक दूसरे को बेहतर अंदाज़ में समझने की ज़रूरत पर-ज़ोर दिया।

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