Saturday , December 16 2017

आसिफ़िया स्टेट सेंट्रल लाइब्रेरी से आसिफ़ जाही अलामत को मिटाने का काम जारी

हैदराबाद 16 फरवरी सलतनत आसिफ़ जाही के ख़ातमा के साथ ही एक मंसूबा बंद साज़िश के तहत मुस्लिम हुक्मरानों के दौर में तामीर कर्दा तारीख़ी इमारतों और मुक़ामात की शिनाख़्त बदलने का एक सिलसिला शुरू किया गया। सब से पहले दुनिया की पहली उर्

हैदराबाद 16 फरवरी सलतनत आसिफ़ जाही के ख़ातमा के साथ ही एक मंसूबा बंद साज़िश के तहत मुस्लिम हुक्मरानों के दौर में तामीर कर्दा तारीख़ी इमारतों और मुक़ामात की शिनाख़्त बदलने का एक सिलसिला शुरू किया गया। सब से पहले दुनिया की पहली उर्दू यूनीवर्सिटी उस्मानिया यूनीवर्सिटी की शिनाख़्त मिटाने की नापाक कोशिश करते हुए उर्दू ज़रिया ए तालीम को ख़त्म किया गया।

तास्सुब पसंद अनासिर ने यूनीवर्सिटी के उस Emblem की शक्ल बदल डाली जिस पर कलिमा तैयबा और हुज़ूर निज़ाम का ताज कुंदा गया था । उसी तरह आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट से लेकर बाग़े आम्मा, असेंबली से लेकर सेक्रेटेरिएट तक हर मुक़ाम की शिनाख़्त को मिटाने की कोशिश की गईं और मुसलमान बड़ी बेबसी से देखते रहे। हालाँकि वो अच्छी तरह जानते हैं कि क़ौमों के नाम और निशान को मिटाने से क़ब्ल इस के तारीख़ी आसार को तबाह किया जाता है।

क़ारईन आज हम आप को शहर की एक ऐसी तारीख़ी इमारत और रियासत के सब से बड़े कुतुब ख़ाना यानी आसिफ़िया स्टेट सेंट्रल लाइब्रेरी के बारे में बताते हैं आज इस तारीख़ी इमारत की भी शनाख़्त मिटाई जा रही है ।

अगर्चे कुतुब ख़ाना आसिफ़िया फरवरी 1891 में मौलवी सैयद हुसैन बिलग्रामी नवाब इमादुल मुल्क की कोशिशों से शुरू किया गया था, लेकिन 1936 में आसिफ़िया स्टेट सेंट्रल लाइब्रेरी की मौजूदा इमारत की 3 लाख रुपये की लागत से तामीर मुकम्मल हुई थी और इस का इफ़्तिताह सातवें आसिफ़ जाह नवाब मीर उसमान अली ख़ांन बहादुर ने बा नफ्से नफीस अंजाम दिया ।

इस मौके पर हुज़ूर निज़ाम ने फ़रमाया था कि ये कुतुब ख़ाना मुल्क के दूसरे कुतुब ख़ानों से किसी तरह कम नहीं । यहां अपनी मुमताज़ नोईयत और ख़ुसूसियत की हामिल कुतुब का कीमती ज़ख़ीरा मौजूद है, लेकिन अफ़सोस के आज उस कुतुब ख़ाना की हईयत और शनाख़्त बदलने की कोशिश की जा रही हैं ।

इसी दौर में इस कुतुब ख़ाना को सारे मुल्क बल्कि बर्रे सग़ीर एशिया में काफ़ी अहमियत हासिल थी । उस की तामीर के मौक़ा पर जो रेलिंग नस्ब की गईं थीं इस में आसिफ़ जाह के नाम और सलतनत आसिफ़ जाही का मोनोग्राम दिखाया गया था ।

कुतुब ख़ाने की रेलिंग में 60 मुक़ामात पर इस तरह के मोनोग्राम नस्ब किए गए थे ताहम रेलिंग निकालने के बहाने इन मोनोग्राम्स को तबाह किया जा रहा है ताकि इस तारीख़ी इमारत पर हुज़ूर निज़ाम या सलतनत आसिफ़ जाही की कोई निशानी बाक़ी ना रहे ।

हद तो ये है कि आसिफ़िया स्टेट सेंट्रल लाइब्रेरी में तामीर के वक़्त किसी मंदिर का वजूद तक नहीं था लेकिन आज आप वहां दो मंदिरों को देख सकते हैं 1956 तक इस का नाम कुतुब ख़ाना आसिफ़िया ही रहा
लेकिन बाद में आसिफ़िया स्टेट सेंट्रल लाइब्रेरी से मौसूम किया गया और फिर ताअस्सुब और शरअंगेज़ी की बदतरीन मिसाल क़ायम करते हुए उसे स्टेट सेंट्रल लाइब्रेरी कहा जाने लगा ।

आप को बतादें कि इस कुतुब ख़ाना में अरबी , उर्दू , तेलुगु , अंग्रेज़ी , हिन्दी वगैरह की 5 लाख से ज़ाइद कुतुब हैं जब कि यहां बच्चों के लिए तलबा के लिए भी दर्सी किताबों का अलहदा सेक्शन रखा गया है ।

काश मिल्लत के हमदर्द इस लाइब्रेरी की हालते ज़ार पर तवज्जा देते और गंगा जमुनी तहज़ीब को फ़रोग़ देने में मसरूफ़ जहद कारों को अपने साथ लेकर हुकूमत से नुमाइंदगी करते तो कितना बेहतर होता।

TOPPOPULARRECENT