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इज़्ज़त-ओ-इक़बाल, ग़लबा-ओ-क़ियादत मुस्लमानों का मुक़द्दर

हैदराबाद ।१५। अगस्त : अल्लाह ताला ने तमाम मख़लूक़ात में इंसानों को जो शरफ़ अता फ़रमाया है वो अज़हर मन अश्शम्स ही। इंसानी जमात में अहल ईमान की शनाख़्त उन के अक़ीदा तौहीद-ओ-रिसालत और फ़राइज़ दीन की पाबंदी के साथ क़ायम है और इंशाओ अल्

हैदराबाद ।१५। अगस्त : अल्लाह ताला ने तमाम मख़लूक़ात में इंसानों को जो शरफ़ अता फ़रमाया है वो अज़हर मन अश्शम्स ही। इंसानी जमात में अहल ईमान की शनाख़्त उन के अक़ीदा तौहीद-ओ-रिसालत और फ़राइज़ दीन की पाबंदी के साथ क़ायम है और इंशाओ अल्लाह क़ियामत तक मोमिन की यही पहचान बनी रहेगी। ईमान वालेफ़र्ज़ इबादतों नमाज़, ज़कात, रोज़ा और हज के ज़रीया तमाम अक़्वाम आलम में मुमताज़ रहेंगी।

अहकाम ख़ुदावंदी की इताअत और इर्शादात-ओ-संत नबवीऐ की पैरवी उऩ्हीं अख़लाक़-ओ-किरदार की बुलंदी से नवाज़ती रहेगी और मुतीअ-ओ-फ़रमांबर्दार मुस्लमान हमेशा सर बुलंद और नुमायां रहेंगे और सारी दुनिया को दीन हक़ की अज़्मतों का एहसास दिलाते रहेंगे ख़ैर अलामम के मंसब की तकमील करते होई दावत-ओ-तब्लीग़ के फ़राइज़पूरे करते रहेंगी। ख़ालिक़ कौनैन की इबादात और मख़लूक़ ख़ुदा से बेहतरीन मुआमलात मुस्लमानों को दुनिया में सुर्ख़रूई से हमकनार करनी, इक़बाल मंदियों से नवाज़ ने औरआख़िरत में अफ़व-ओ-मग़फ़िरत-ओ-नजात की नेअमतों से मालामाल होने का शरफ़ बख्शते हैं।

माबूद हक़ीक़ी की इबादात में इख़लास बंदों को तक़र्रुब हक़तआला के अनवार से बहरामंदकरता है । रोज़ा इख़लास का सब से अहम मज़हर फ़रीज़ा है। बंदा का मुसलसल एक माह तक औक़ात सोम में अक्ल-ओ-शरब-ओ-जमा से इजतिनाब-ओ-अहितराज़ इस के अपने ख़ालिक़-ओ-परवरदिगार से सच्ची मुहब्बत और इस की रज़ा के हुसूल के लिए कामिलइताअत का मूसिर तरीन मुज़ाहरा ही। रोज़ा में जो ममनूआ उमूर हैं इन से महिज़ तामील-ए-हुकम इलाही में रुके रहना ही दरहक़ीक़त असल इताअत और सुपुर्दगी है रोज़ादार को इसी जज़बा-ओ-अमल का अज़ीमुश्शान अज्र-ओ-सवाब अता होता है।

डाक्टर सय्यद मुहम्मद हमीद उद्दीन शरफ़ी डायरेक्टर आई हरक ने रमज़ान मुबारक के रूह प्रवर माहौल में 24 रमज़ान उल-मुबारक को बाद नमाज़ ज़ुहर मस्जिद कौसर गोलकुंडा और क़बल इफ़तारछः बजे शाम हमीदिया शरफ़ी चमन में रोज़ा दारों के इजतिमा से ख़िताब की सआदतहासिल करते होई इन हक़ायक़ का इज़हार किया। वो इस्लामिक हिस्ट्री रिसर्च कौंसल इंडिया (आई हरक) की हज़रत ताज अलारफ़ाइऒ यादगार ख़ताबात के सोलहवीं साल के 24 वें रोज़ के इजलासों से ख़िताब कर रहे थे जो करा-ए-त कलाम पाक से शुरू हुई।

बारगाह शहनशाह कौनैन ऐमीं हदया नाअत पेश की गई। डाक्टर हमीद उद्दीन शरफ़ी ने सिलसिला कलाम जारी रखते होई अहादीस के हवालों से कहा कि नीयत पर आमाल का दार-ओ-मदार होता है पहले नीयत बाद में अमल अगर नीयत ख़ैर के बावस्फ़ अमल ख़ैर का सदूर ना भी हो तो तब भी अच्छी नीयत और नेक इरादों का अज्र-ओ-सवाब मिल जाता है और अगर नेक नीयत के मुवाफ़िक़ अमल सालिह का सदूर हो जाए तो फिर अमल का सवाब कई गुना ज़्यादा मिलता है रमज़ान मुबारक में ये शरह सवाब बहरहाल बढ़ जाती ही। उन्हों ने कहा कि इफ़रात-ओ-तफ़रीत से अलग एतिदाल-ओ-तवाज़ुन दीनी तालीमात का ख़ास्सा है तमाम इस्लामी अहकाम-ओ-फ़राइज़ में ये ख़ुसूसीयत वाज़िह है और रोज़ा उस की सब से मूसिरमिसाल है साल भर में 29 या 30 दिन के रोज़े तज़किया नफ़स, तसफ़ीया-ए-क़्लब औरइस्लाह ज़ाहिर-ओ-बातिन की ज़मानत और रोज़ा दारों को रुहानी लताफ़तों से नवाज़ने का ज़रीया हैं।

डाक्टर हमीद उद्दीन शरफ़ी ने कहा कि रमज़ान मुबारक में रोज़ा के बराबर कोई अमल नहीं रोज़ा की सूफियाना तशरीह यूं की जाती है कि आम लोगों के लिए रोज़ा खाने पीने और जमा से मुईन वक़्त तक अहितराज़-ओ-परहेज़ के शरई हुक्म के साथ ख़ास है लेकिन ख़ासान ख़ुदा और मक़बोलान बारगाह इलाही इन तमाम पाबंदीयों के साथ साथ अपने वजूद के हर हिस्सा और अपने बदन के हर उज़ू को ताबे फ़रमान हक़तआला बना लेते हैं जिस के नतीजा में वो तक़र्रुब इलाही की बेबहा नेअमत से बहरामंद हो जाते हैं।

रमज़ान मुबारक में अबवाब समाअत का खुल जाना अल्लाह ताला की रहमतों के नुज़ूल की दलील, अबवाब जन्नत का वा होना बख़शिश-ओ-मग़फ़िरत और अतए जन्नत की नवेद, दोज़ख़ के दरवाज़ों का बंद हो जाना आग और अज़ाब से नजात का मुज़्दा और शयातीन का ज़ंजीरों में जकड़ कर क़ैद कर दिया जाना गोया बुराईयों, गुमराहियों और गुनाहों के रास्तों का मसदूरहो जाना ही। लिहाज़ा अल्लाह ताला की इताअत और रसूल अल्लाह ई की फ़रमांबर्दारी और अहकाम क़ुरआन-ओ-सुन्नत की पानबदी और हुसूल तर्बीयत सालहा का ये बेहतरीन मौक़ा और वसीला है।

नेकी और सालहीत की इस माह में जो मश्क़ होती है इस का मक़सूद भी यही है कि ग्यारह महीनों तक इस पर मुदावमत हो। डाक्टर हमीद उद्दीन शरफ़ी ने कहा किरमज़ान उल-मुबारक के दिन और रातें यकसाँ तौर पर अज़मत वाली होती हैं दिन इबादत सोम से और रातें इबादात क़ियाम-ओ-तिलावत-ओ-समाअत क़ुरआन मजीद, ज़िक्र-ओ-तस्बीह से सबब रहमत बन जाती हैं।

उन्हों ने कहा कि माह रमज़ान में निसाब वालों का ज़कात अदा करना और मदात ख़ैर से ज़रूरतमंद बंदों की माली इआनत करना निहायत ही पसंदीदा और अज्र अज़ीम का मूजिब अमल है। फ़िक्रा-ए-, मसाकीन, क़र्ज़दारों, मुसाफ़िरों और राह ख़ुदा में अच्छे मक़सद के लिए ख़र्च करना सआदत है बिलख़सूस ज़रूरतमंद अक़रबा-ए-और दूर नज़दीक के रिश्तेदारों की माली ख़िदमत हर लिहाज़ से तर्जीह रखती है। इजलास के आख़िर में बारगाह रसालत ऐ में सलाम पेश किया गया और रक्त अंगेज़ दुआएं की गईं।

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