Wednesday , December 13 2017

इताअते खुदा-ओ-रसूल का हुक्म

ए ईमान वालो!

ए ईमान वालो! इताअत करो अल्लाह ताआला की और इताअत करो (अपने ज़ीशान) रसूल(स०अ०व०) की और हाकिमों की जो तुम में से हूँ, फिर अगर झगड़ने लगू तुम किसी चीज़ में तो लौटा दो उसे अल्लाह और (अपने) रसूल (स०अ०व०) (के फ़रमान) की तरफ़ अगर तुम ईमान रखते हो अल्लाह पर और रोज़ क़ियामत पर, यही बेहतर है और बहुत अच्छा है इस का अंजाम। (सूरत अलनिसा-ए-।५९)

इस आयत में अल्लाह ताआला और इस के रसूल मुकर्रम (स०अ०व०)की इताअत के अलावा मुस्लिम उमरा-ए-और हुक्काम की इताअत का भी हुक्म दिया गया है।

उसकी वजह ज़ाहिर है, क्यूंकि हुज़ूर (स०अ०व०) को इसदार फ़ानी में ज़्यादा देर इक़ामत गज़ीं नहीं होना था और आप(स०अ०व०)के बाद उमूर ममलकत की ज़िम्मेदारी खल़िफ़ा-ए-और उमरा-ए-को सँभालना था, इस लिए उनकी इताअत के मुताल्लिक़ भी ताकीद फ़रमाई।

लेकिन इताअत रसूल(स०अ०व०) और इताअत अमीर में एक बैन फ़र्क़ है। नबी मासूम होते हैं जुमला उमूर में ख़ुसूसन अहकाम शरई की तब्लीग़ में उनसे ख़िताब नहीं होसकती, इसी लिए उनकी इताअत का जहां हुक्म दिया ग़ैर मशरूत इताअत का हुक्म दिया गया।

लिहाज़ा रसूल(स०अ०व०) का हर हुक्म वाजिब उल-तसलीम और अटल है, इस में किसी को मजाल कील-ओ-क़ाल नहीं, जबकि ख़लीफ़ा का मासूम होना ज़रूरी नहीं, इस से ग़लती भी होसकती है, इस लिए उसकी मशरूत इताअत का हुक्म दिया गया कि इसके हुक्म को ख़ुदा-ओ-रसूल(स०अ०व०) के फ़रमान की रोशनी में पर खो।

अगर इस के मुताबिक़ है तो इस पर अमल करो, वर्ना वो काबिले अमल नहीं। इसी तरह अगर तुम्हारे दरमयान तनाज़ा पैदा हो जाये तो उसे लौटा दो अल्लाह और इस के रसूल(स०अ०व०) की तरफ़, यानी इस हुक्म का क़ुरआन-ओ-सुन्नत की रोशनी में जायज़ा लो। अगर इसके मुताबिक़ है तो इस पर अमल करो, वर्ना तुम पर उसकी इताअत फ़र्ज़ नहीं।

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