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इबादत सोम दरअसल सब्र-ओ-इस्तिक़ामत की सच्ची और कामिल निशानी

हैदराबाद ।२‍‍‍‍‍‍६ जुलाई: अल्लाह ताला ने अपने फ़ज़ल-ओ-करम से इंसानों को अपनी जुमला मख़लूक़ात में मुंतख़ब फ़र्मा कर उन्हें अफ़ज़लीयत और अशर्फ़ीयत के ख़ुसूसीएज़ाज़ से नवाज़ा। फिर इंसानी जमात में अपने हबीब हुज़ूर अकरम सिल्ली अल्

हैदराबाद ।२‍‍‍‍‍‍६ जुलाई: अल्लाह ताला ने अपने फ़ज़ल-ओ-करम से इंसानों को अपनी जुमला मख़लूक़ात में मुंतख़ब फ़र्मा कर उन्हें अफ़ज़लीयत और अशर्फ़ीयत के ख़ुसूसीएज़ाज़ से नवाज़ा। फिर इंसानी जमात में अपने हबीब हुज़ूर अकरम सिल्ली अल्लाह अलैहि-ओ-आलही-ओ-सल्लम की उम्मत को ईमान की दौलत से सरफ़राज़ फ़र्मा कर इज़्ज़त दाइमीसे मुफ़्तख़िर फ़र्मा दिया। मुस्लमान अपने ईमान यानी तौहीद-ओ-रिसालत के अक़ीदा हक़ और इबादत यानी नमाज़, ज़कात ,रोज़ा और हज जैसे फ़राइज़ अज़ीम और मुआमलात में अहकाम इलाही-ओ-फ़रामीन रिसालत पनाही ई के मुवाफ़िक़ रास्ती और दरूस्तगी के ज़रीया हर दौर में अपने आला रो्वीयों के सबब मुनफ़रद शनाख़्त बनिए रहे और इंशाअल्लाह ताला हमेशा सच्चाई और अच्छाई का ये मयार क़ायम रखेंगी। इबादात और मुआमलात ये दो अहम पहलू मोमिनाना ज़िंदगी के हक़ायक़ हैं अल्लाह ताला की अबात में इख़लास और ख़ौफ़-ओ-ख़ुज़ू-ओ-नीज़ जुमला अहकाम ख़ुदावंदी पर मुदावमत अमल और मुआमलात-ए-ज़िंदगी में क़ुरआन-ओ-सुन्नत की हिदायत कामिल पर अमल पीराई एक मुस्लमान की असली पहचान है यही हक़ायक़ तमाम इंसानी जमात में अहल ईमान की इज़्ज़त का बाइसहैं ।

इताअत हक़तआला और इत्तिबा रसालतऐ मैं वाक़ातन मुस्लमानों की सरबुलन्दी और कामयाबी ही। माह रमज़ान उल-मुबारक में इन इताअतों के रूह प्रवर नज़ारे देखे जा सकते हैं। इबादत सोम के साथ नमाज़ पंजगा ना बाजमाअत की अदायगी, इन्फ़ाक़, ख़ैरात, गरबा-ए-ओ- मसाकीन की दिलदही, फ़रीज़ा ज़कात की अदाई के साथ साथ हररोज़ा दार अमलनअख़लाक़ हसना और बुलंद किरदारी के लिहाज़ से काबिल-ए-तहसीन नमूना अमल पेश करता है । किज़्ब, वाअदा ख़िलाफ़ी, चुगु़ली, धोका, इज़ार सानी, जबर-ओ-ज़ुलम से दूर सिदक़-ओ-सफ़ा, एफ़ए अह्द, अमानतदारी, रहम-ओ-मुरव्वत और ईसार-ओ-हमदर्दी केऔसाफ़-ए-हमीदा से मुत्तसिफ़ हो कर रुहानी , अख़लाक़ी तर्बीयत से फ़ैज़ याफ़ता नज़र आता है और एक माह का यही मामूल उसे तमाम साल एक अच्छा और सच्चा फ़रमांबर्दार बंदाबनिए रखने में मुआवनत करता है।

इबादत ख़ालिक़ और ख़िदमत-ए-ख़लक़ इस माह-ए-मुबारक के रोशन ख़साइस हैं। अल्लाह ताला की इबादत में ख़ुलूस दुनिया में सुर्ख़रूई और उखरवी नेअमतों से सरफ़राज़ी का ज़ामिन है बिलाशुबा रोज़ा इसी इख़लास हक़ीक़ी की मज़हर इबादत है इस में रिया या दिखावे का शाइबा तक नहीं इसी वजह से रोज़ादार के लिए मुनफ़रद अज्र अज़ीम है रोज़ा मुहब्बत इलाही की रोशन अलामत,इताअत हक़ काउजाला और रज़ए हक़ के हुसूल के जज़बा-ए-कामिल का निशान ही। अल्लाह ताला की कामिल इताअत बंदा को दारेन में हर सआदत से मालामाल करती है।

इन ख़्यालात काइज़हार करते होई डाक्टर सय्यद मुहम्मद हमीद उद्दीन शरफ़ी डायरेक्टर आई हरक ने 4रमज़ान उल-मुबारक को ढाई बजे दिन मस्जिद मुस्तफ़ा सय्यद नगर २ और बाद नमाज़अस्र हमीदिया वाक़्य शरफ़ी चमन ,सब्ज़ी मंडी में रोज़ा दार मुस्लियों के इजतिमाआत सेख़िताब का शरफ़ हासिल किया। इस्लामिक हिस्ट्री रिसर्च कौंसल इंडिया (आई हरक) और इंतिज़ामीया मस्जिद के तआवुन से मुनाक़िदा सोलहवीं सालाना हज़रत ताज उलार फा-ए-सैफ शरफ़ी ऒ यादगार ख़ताबात के चौथे दिन के इजलासों का आग़ाज़ करा-ए-त कलाम पाक से हुआ।

डाक्टर हमीद उद्दीन शरफ़ी ने सिलसिला ब्यान जारी रखते होई कहा कि ये हक़ीक़त हदीस शरीफ़ से साबित है कि आमाल का दारू मदार नीयत पर ही। डाक्टर हमीदउद्दीन शरफ़ी ने कहा कि रमज़ान मुबारक में अल्लाह ताला अपने बंदों पर करम ख़ास फ़रमाता है इसी वजह से आसमानों के दरवाज़े खुल जाते हैं और रहमत परवरदिगार कानुज़ूल होता है जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं ताकि रोज़ा दारों के लिए मग़फ़िरत का सामान हो अबवाब जहीम का बंद करदिया जाना आग-ओ-अज़ाब दोज़ख़ से नजात का मुज़्दा है ।

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