Tuesday , December 12 2017

इब्ने सफ़ी की ज़िंदा जावेद तहरीरें उर्दू अदब का क़ाबिले फ़ख़्र सरमाया

जासूसी नावेलों के ज़रीए उर्दू ज़बान को मक़बूल आम बनाने में इब्ने सफ़ी के नाक़ाबिले फ़रामोश किरदार को मल्हूज़ रखते हुए उन की ज़िंदा जावीद तहरीरों को उर्दू अदब का क़ाबिले फ़ख़्र हिस्सा क़रार दिया जाना चाहीए। इब्ने सफ़ी की पुरकशिश और लाफ़ानी

जासूसी नावेलों के ज़रीए उर्दू ज़बान को मक़बूल आम बनाने में इब्ने सफ़ी के नाक़ाबिले फ़रामोश किरदार को मल्हूज़ रखते हुए उन की ज़िंदा जावीद तहरीरों को उर्दू अदब का क़ाबिले फ़ख़्र हिस्सा क़रार दिया जाना चाहीए। इब्ने सफ़ी की पुरकशिश और लाफ़ानी तहरीरों ने एक नस्ल को उर्दू ज़बान और तहज़ीब से जोड़े रखा है। इन ख़्यालात का इज़हार आज मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनीवर्सिटी में मुक़र्ररीन ने 2 रोज़ा क़ौमी सेमीनार बाउनवान सिरी अदब और इब्ने सफ़ी के इफ़्तेताही इजलास में किया। प्रोफ़ेसर मुहम्मद मियां वाइस चांसलर ने सदारत की।

प्रोफ़ेसर मुजाविर हुसैन रिज़वी ने अपने शख़्सी तजुर्बात ब्यान करते हुए कहा कि एक रिसाला निकहत निकला करता था जिस में इसरार अहमद (इब्ने सफ़ी) ने मुदीर एज़ाज़ी की हैसियत से काम किया। इस के मुदीर हुसैन हैदर (अब्बास हुसैन के वालिद) एक जासूसी नावेल डॉक्टर राही मासूम रज़ा से लिखवाना चाहते थे।
जबकि ये नावल प्रोफ़ेसर मुजाविर हुसैन रिज़वी के कहने पुर इसरारअहमद (इब्ने सफ़ी) ने सिर्फ़ एक हफ़्ता में लिख दिया। इतने दिनों में राही महज़ 12 सफ़हात ही लिख पाए थे।

इस नावेल को हुसैन हैदर ने एक नया रिसाला जासूसी दुनिया जारी करते हुए शाय किया और इस नावल का उनवान दिलेर मुजरिम था। इस तरह इब्ने सफ़ी ने जासूसी दुनिया के लिए अपने ग़ैर मामूली क़लमी सफ़र का आग़ाज़ किया। प्रोफ़ेसर मुजाविर हुसैन रिज़वी साबिक़ सदर शोबा उर्दू यूनीवर्सिटी ऑफ़ हैदराबाद ने इन बातों का इन्किशाफ़ किया।

प्रोफ़ेसर मुजाविर हुसैन जो इसरार अहमद (इब्ने सफ़ी) के रफ़ीक़ ख़ास रहे हैं ने इब्ने सफ़ी से इबतिदाई दिनों में रहे ताल्लुक़ के हवाले से अपने तजुर्बात निहायत दिलचस्प अंदाज़ में ब्यान किए। उन्हों ने कहा कि इब्ने सफ़ी से उन की दोस्ती काफ़ी गहिरी थी। अगस्त 1947 से अगस्त 1952 तक प्रोफ़ेसर मुजाविर हुसैन रिज़वी और इब्ने सफ़ी ने एक साथ काफ़ी वक़्त गुज़ारा।

ये तमाम अनासिर हमें इब्ने सफ़ी की नावेलों में मिलते हैं। प्रोग्राम का आग़ाज़ बिलाल अहमद डार की तिलावत कलामे पाक और तर्जुमानी से हुआ। प्रोफ़ेसर मुहम्मद मियां ने अपने सदारती ख़िताब में कहा कि इब्ने सफ़ी के नावेल ज़हनी कसरत का अच्छा ज़रीया हैं। प्रोफ़ेसर रहमत उल्लाह ने अपने ब्यान को जारी रखते हुए मज़ीद कहा कि संजीदा अदब के क़ारईन हों कि तफ़रीही अदब के शायक़ीन हर दो ने इब्ने सफ़ी के नावेलों की ख़ूब पज़ीराई की है। डॉक्टर नसीम उद्दीन फ़रीस सदर शोबा उर्दू ने मेहमानों का तआरुफ़ पेश किया।

डॉक्टर इरशाद अहमद ने शुक्रिया अदा किया। प्रोफ़ेसर मुहम्मद महमूद सिद्दीक़ी ने कार्रवाई चलाई। डॉक्टर ख़्वाजा मुहम्मद शाहिद प्रो वाइस चांसलर भी शहि नशीन पर मौजूद थे। मुल्क भर से स्कॉलर्स मक़ाला निगार और मंदूबीन ने की बड़ी तादाद सेमीनार में शरीक रहे। इफ़्तेताही इजलास में सेमीनार का किताब ख़वातीन की तहरीरें ख़वातीन से मुताल्लिक़ तहरीरें की रस्म इजरा भी अंजाम दी गई।

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