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इस्लामिक दुनिया के पांच फिलॉसफ़र और उनके बेजोड़ कारनामे

इस्लामिक बौद्धिक परंपरा एक संक्रमण काल से गुजर रहा है। वहीं आज मुस्लिम दुनिया में कुछ ऐसे दार्शनिक हैं जिन्हें यूट्यूब पर सबसे अधिक सुना जाता है और उनके काफी समर्थक हैं। क्या यह हमें बताता है कि लोगों के ज्ञान का दायरा बढ़ रहा है, लेकिन उपदेश और सोच के बीच के भेद को समझना मुश्किल हो गया हैं। मुस्लिम समुदाय के बौद्धिक स्तर को बढ़ावा तभी मिलेगा जब पढ़ने और दार्शनिक आख्यानों दिलचस्पी की आदत पड़ जाए। अंत में, मैं पांच मुस्लिम दार्शनिकों के नाम की सिफारिश करना चाहता हूं जिसे सभी मुसलमानों को पढ़ना चाहिए। इसका सीधा मक्सद पढ़ने में दिलचस्पी को बढ़ाना है। आज कोई भी छात्र या शिक्षक इन महान मुस्लिम दार्शनिकों के बारे में पढ़ने की जरूरत नहीं समझता है। उनके बेहतरीन कारनामें इस्लाम के स्वर्णकाल के स्वर्णिमकाल के तरफ इशारा करते हैं। हर शिक्षित मुसलमान को अपने इस बौद्धिक विरासत से परिचित होना चाहिए। आमतौर पर अधिकतर मुसलमान इनके बारे में पढ़ते और जानते नहीं हैं। कम-से-कम उनके माध्यमिक स्रोतों और कार्यों को पढ़कर आप इस्लामी सभ्यता के बौद्धिक व्यापकता का पता लगा सकते है।

अल-फराबी (872-951 ईसवी)

अबू नस्र मुहम्मद अल-फराबी अरबी में अल-मुअल्लीम अल-थानी के नाम से जाने जाते हैं। उन्होंने न सिर्फ अरस्तू और प्लेटो के विचारों को मध्य एसिया तक फैलाया बल्कि यूनानी दर्शन शास्त्र को संरक्षित और विकसित भी किया। उन्होंने दर्शन, गणित, संगीत और आध्यात्मविज्ञान के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने राजनीति दर्शनशास्त्र में बेहतरीन काम किए। राजनीतिक दर्शन पर उनकी सबसे महत्वपूर्ण किताब ‘आरा अहल अल-मदीना अल-फदिला’ (द व्यू ऑफ पीपल ऑफ़ द वर्चुअस सिटी) है। इस किताब में अल-फराबी की न्याय पर आधारित एक गुणी शहर की व्याख्या है, जो प्लेटो की लोकतंत्र पर आधारित है, जहां के नागरिक बहुत सुखी है और वे दार्शनिकों के प्रबुद्ध विचारों को दिशा निर्देशों का पालन करते है।

मेरे विचार में अल-फराबी पहले ऐसे मुस्लिम थे जिन्होंने स्पष्ट तौर पर लोकतंत्र की खूबियों पर चर्चा की। जो कोई भी इस्लाम और लोकतंत्र पर तर्क करना चाहता है, तो उसे अल-फराबी के लोकतंत्र समर्थक विचारों को ज़रूर पढ़ना चाहिए। अल-फराबी का विचार है कि स्वतंत्र समाज के अंदर के एक गुणी समाज होता हैं, क्योंकि स्वतंत्र समाज में अच्छे लोग पुण्य का पीछा करते हैं। अल-फराबी रौशनख्याल विचारक थें। उनका विचार न सिर्फ राजनीति विचारों को फैलाव करता है बल्कि खुद के सोच को भी विस्तार देता है।

अल-गज़्ज़ाली (1058-1111 ईस्वी)

अबू हामिद अल-गज़्ज़ाली इस्लाम के महत्वपूर्ण विचारकों में से एक थें। वे न सिर्फ दार्शनिक थे, बल्कि एक कानूनी शास्त्री और धर्मशास्त्री भी थें। उन्हें इब्न अरबी के कोटी का रहस्यमय विचारक माना जाता है। बहुत से मुसलमानों के लिए अल-गज़्ज़ाली इस्लाम को फिर से जीवंत कर देने वाले आदर्श मुजद्दिद थे। एक समय था जब दार्शनिकों और धर्मशास्त्रियों, तर्कवादियों और परंपरावादियों, रहस्यमय और रूढ़िवादियों के बीच काफी बहस-मुबाहिसा होता था। अल-गज़्ज़ाली ने इन सब के बीच की खाई को पाटने में अहम रोल अदा दिया। उनका ‘इह्या उलूम अल-दीन’ किताब ने धार्मिक विज्ञान के पुनरुद्धार के लिए एक बड़ा रोल अदा किया। अल-गज़्ज़ाली के परिपक्व विचार काफी रोचक है। बौद्धिक गिरावट और बाद में आध्यात्मिकता की तरफ लौटने के बाद, वे भारत के शेख रब्बानी की तरह पसंद किए गए। शेख रब्बानी ऐसे विद्वान थें जिनका शरिया और तारिकाह (कानून और रहस्यवाद) पर किया गया काम अद्वितीय है।

इब्न रूश्द (1126-1198 ईस्वी)

इब्न रूश्द को पश्चिम में आवेरोस कहा जाता है। पश्चिमी धर्म और दर्शन पर इनका बड़ा प्रभावी रहा है। कुछ मुस्लिम इतिहासकार आवेरोस के कामों को आधुनिकता का परिचायक मानते है। इब्न रुश्द एक उल्लेखनीय विचारक थे। वे एक जज, इस्लामिक कानूनविद् (मालिकी), चिकित्सक और दार्शनिक थे। उन्होंने ‘फस्ल अल-मक़ल’ में दर्शनशास्त्र की वास्तविकता और विज्ञान और धार्मिक विश्वासों के संगति पर विचार किया है। उनकी ‘तहाफत अल-तहाफत’ (इंकोहेरेंस ऑफ़ इंकोहेरेंस) अल-गजाली की रचना ‘तहत अल-फसिला’ की विस्तार तरदीद और अरस्तू के दर्शन का एक मजबूत रक्षा कवच है। इब्न रुश्द और अल-गजाली दोनों इस्लामी दार्शनिक विरासत के मुख्य आकर्षण हैं। जो मुसलमान ने इन दोनों दार्शनिकों पढ़ा होगा, वो बखूबी उनके तर्कशैली से परिचित होगा।

 इब्न अरबी (1165-1240 ईस्वी)

इब्न अरबी अपने समय के अद्वितीय और सबको हैरान कर देने वाले मुस्लिम दार्शनिक विचारक रहे हैं। वे अल-फराबी और इब्न रुश्द की तरह एक तर्कसंगत दार्शनिक नहीं थे। वे रहस्यवादी, विचारशील और अवर्णनीय विचारक थे। इब्न अरब को सबसे पहला उत्तर आधुनिक नारीवादी विचारक माना जाता है। उनके ग्रंथ ‘फुसुस अल-हीकाम’ और ‘फुतुहात अल-मकियह’ में इस्लामी रहस्यवाद और उसके दार्शनिक पहलुओं पर चर्चा की गई है। सौभाग्य से, प्रोफेसर विलियम चिट्टीक ने इब्न अराबी की बहुत-सी किताबों का अनुवाद और उनके विचारों पर टिप्पणी की। उसने मेरी तरह के आम लोगों को समझ पाने के लायक बनाया है। निजी तौर मैं इब्न अरबी के जरिए ही खुदा और उसके सृष्टि के अर्थ को समझ पाया हूं। उनके पवित्र ग्रंथों के अंश को पढ़ने के बाद इंसान हर बार आश्चर्यचकित हो उठता है। बहुत से ऑर्थोडॉक्स विद्वान इब्न अरबी से भय और नफरत करते हैं, क्योंकि वे उन्हें नहीं समझ पाते हैं। अगर आप मुसलमान और बौद्धिक सोच रखने हैं, और आपने कभी इब्न अरबी, अल-शेख अल-अकबर को पढ़ा नहीं तो यह बहुत त्रासदी की बात है।

 इब्न खलदुन (1332-1406 ईस्वी)

इब्न खलदुन सभी सामाजिक वैज्ञानिकों के शेख कहे जाते हैं। वे पहले इतिहास के दार्शनिक और पहले सोशल वैज्ञानिक माने हैं। वे पहले ऐसे इस्लामी विचारक थे जिन्होंने प्रयोगात्मक नोर्मेटिव थ्योरी पर बल दिया। इब्न खलदुन ने सोशल साइंस में तीन अहम योगदान दिए। उन्होंने प्रयोगात्मक तथ्यों के महत्व पर बल दिया, परिवर्तन के एक सिद्धांत का प्रतिपादन किया और परिवर्तन संचालक के तौर पर आदिवासी एकजुटता की पहचान की।

आज मुसलमानों को ऐसे सोशल साइंटिस्टों की ज़रूरत है जो मुस्लिम दुनिया में सुशासन ला सकें। पिछले साल इस्तांबुल में मैंने एक कॉफ्रेंस में इब्न खलदुन पर आख्यान दिया था। लोगों ने जब इस पर रूचि खाई तो मुझे बेहद हैरानी भी हुई और खुशी भी। इसे पुनर्जीवित करने के लिए मैंने ऐसे बहुत से सम्मेलनों में भाग लिया। यहां तक कि सामाजिक विज्ञान पर खलादुनिया दृष्टिकोण का निर्माण किया। मैं नहीं जानता कि इसमें कितना सफल रहा, पर एक कोशिश जो मैं कर सकता था उसे किया। मुझे लगता है कि सभी मुस्लिम विद्यालयों और कॉलेजों में इन्हें पढ़ाए जाने की जरूरत है। अगर उनके राजनीतिक सिद्धांत और कूटनीति पर लाइब्रेरी बनवाया जाए तो यह बेहद सराहनीय कदम होगा। मुझे आशा है कि इस इस्लामी विद्वानो के बहुत छोटे से परिचय में युवा मुसलमानों के अंदर इस्लामी विरासत के प्रति रुचि पैदा होगी।

लेखक: मुकत्दीर खान

साभार: हफ्फिंगटनपोस्ट

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