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इस्लाम मसाइल ( समस्यांए) का शिकार इंसानियत के लिए बेहतरीन निज़ाम

एक ऐसे वक़्त में जब कि पूरी इंसानियत मुख़्तलिफ़ मसाइल और मसाइब से कराह रही है और ज़हनी करब-ओ-अज़ीयत से दोचा र है इस्लाम सिसकती हुई इंसानियत के लिए सबसे बेहतरीन निज़ाम हयात और दीन रहमत के तौर पर तमाम मसाइल का हल पेश करता है।

एक ऐसे वक़्त में जब कि पूरी इंसानियत मुख़्तलिफ़ मसाइल और मसाइब से कराह रही है और ज़हनी करब-ओ-अज़ीयत से दोचा र है इस्लाम सिसकती हुई इंसानियत के लिए सबसे बेहतरीन निज़ाम हयात और दीन रहमत के तौर पर तमाम मसाइल का हल पेश करता है।

इन ख़्यालात का इज़हार आज यहां इमाम ए हरम मक्का मुकर्रमा डाक्टर शेख़ सऊद बिन इबराहीम अलशरीम(Sheikh Saud bin Ibrahim al Shuraim) ने किया।
डाक्टर अलशरीम यहां राम लीला ग्रांऊड में मर्कज़ी जमात अहल-ए-हदीस ( अहले हदीस) के ज़ेर‍ ए‍ एहतेमाम दो रोज़ा इकतीस्वीं अहल-ए-हदीस कान्फ्रेंस के मौक़ा पर नमाज़ जुमा का ख़ुत्बा दे रहे थे। इमाम ए हरम ने कहा कि ज़रूरत इस बात की है कि तमाम बिद्दतों से बचते हुए इस्लाम क़व्वास की हक़ीक़ी शक्ल में पेश किया जाए और इसका अमली नमूना मुआशरे के सामने लाया जाए जिससे मुआशरे में अमन-ओ-आश्ती और फ़िर्कावाराना हम आहंगी को फ़रोग़ हासिल हो।

इमाम हरम मक्का मुकर्रमा ने हिंदूस्तान में अपनी आमद को अपने लिए सआदत क़रार देते हुए कहा कि हिंदूस्तान जैसे अज़ीम मुल्क और यहां के अवाम के लिए उन के दिल में हमेशा मुहब्बत‍ और एहतेराम का जज़बा रहा है वो सरज़मीन हिंद पर आकर ख़ुद को अपने घर में महसूस कर रहे हैं।

उन्होंने याद दिलाया कि सहाबा इकराम की रिवायतों में हिंदूस्तान से ख़ुसूसी ताल्लुक़ और मुहब्बत का ज़िक्र भी मिलता है। उन्हों ने कहा कि इस बात की ज़रूरत है कि सहाबा को रोल मॉडल के तौर पर बला तफ़रीक़ मज़हब-ओ-मिल्लत और मसलक हर शख़्स के सामने पेश किया जाए ताकि उनकी आईडीयल तालीमात से हर कोई इस्तेफ़ादा कर सके।

इमाम ए हरम ने नमाज़ जुमा की इमामत की जिसमें तक़रीबन एक लाख अफ़राद ने शिरकत की। कल बाद नमाज़ मग़रिब वो ख़ुसूसी ख़िताब फ़रमाएंगे और इशा की नमाज़ की इमामत भी करेंगे।वाज़िह रहे कि डाक्टर अलशरीम 1991 से मक्का मुकर्रमा में हरम शरीफ़ के इमाम-ओ-ख़तीब हैं। वो सऊदी अरब में जज के ओहदे पर भी फ़ाइज़ रह चुके हैं।

क़ब्लअज़ीं मर्कज़ी जमाअत अहल-ए-हदीस ( अहले हदीस) के मर्कज़ी अमीर हाफ़िज़ मुहम्मद यहया देहलवी ने अपने ख़ुतबा सदारत में अदालत सहाबा कान्फ्रेंस की ग़रज़-ओ-ग़ायत बताते हुए कहा कि हमें इन नफ़ूस क़ुदसिया की ताबिंदा ज़िंदगी की सुनहरी किरणों से अपनी ज़ात गुर्दो पेश और अपने महबूब वतन के तूल वारज़ को मामूर-ओ-मुनव्वर करना चाहीए।

उन्होंने कहा कि आज दुनिया जिस बदअमनी और अख़लाक़ी बेराह रवी की तरफ़ जा रही है इसको हिदायत और रहनुमाई सिर्फ़ सहाबा इकराम के मुक़द्दस गिरोह से मिल सकती है। उन्होंने मुस्लमानों को अपने आमाल को सुधारने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा कि आज जिस मुस्लमान जिन मसाइब-ओ-मुश्किलात और इबतिला-ओ- आज़माईश का शिकार हैं वो सिर्फ़ आदा इस्लाम की साज़िशों का नतीजा नहीं है बल्कि इसमें हमारी बदआमालियों और फ़िक्री-ओ-नज़रियाती इन्हिराफ़ का भी अमल दख़ल है। मर्कज़ी जमाअत अहल-ए-हदीस (अहले हदीस) के जनरल सेक्रेटरी मौलाना असग़र इमाम मेंहदी सलफ़ी ने इमाम ए हरम की शिरकत को कान्फ्रेंस के शुरका ( साझेदार लोग) और अहले वतन के लिए बाइस सआदत क़रार दिया।

उन्होंने कहा कि एक ऐसे वक़्त में जब मुआशरे में हर तरफ़ बदअमनी और अफ़रातफ़री के साथ साथ ख़ौफ़-ओ-हरास की फ़िज़ा पाई जा रही है कोई शख़्स अपने आप को महफ़ूज़ महसूस नहीं कर रहा है नीज़ ज़हनी तनाव का शिकार है सहाबा ए किराम ( सहाबा इकराम) की हयात मुबारका और उनकी तालीमात सब के लिए मशाल राह ही नहीं बल्कि अमली नमूना है।

उन्हों ने कहा कि मर्कज़ी जमात अहल-ए-हदीस सहाबा ए किराम को आज भी इंसानियत की फ़लाह का मीआर तस्लीम करती है और इसी वजह है कि इसने दो साल क़ब्ल भी अज़मत सहाबा कान्फ्रेंस का इनइक़ाद किया था और फिर उस मर्तबा अदालत सहाबा के मौज़ू पर इक्कीस्वीं अहल-ए-हदीस कान्फ्रेंस कर रही है।

मौलाना अबदुर्रहमान उबैदुल्लाह रहमानी मुबारक पूरी ने ख़ुतबा इस्तेक़बालीया दिया।

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