Wednesday , December 13 2017

इक़तिसादी ख़सारा को कम करना ज़रूरी

अपने अव्वलीन बजट से क़बल वज़ीर फिनांस अरूण जेटली ने कल‌ कहा कि इक़तिसादी ख़सारा को एक काबिल-ए-क़बूल सतह पर बरक़रार रखने की ज़रूरत है और इसके लिए अख़राजात को महदूद करने की बजाय मआशी तौसीअ और टेक्स निज़ाम में बेहतरी की राह इख़तियार की जा सकती है।

राज्य सभा में वक़फ़ा सिफ़र के दौरान सवालात के जवाब देते हुए अरूण जेटली ने कहा कि इक़तिसादी बेहतरी ज़रूरी है कि अगर ये ख़सारा क़ाबू से बाहर होगया तो इस के नतीजा में फ़ौरी और ज़रूरी अख़राजात के लिए भी क़र्ज़ हासिल करना पड़ेगा। जेटली ने कहा कि अगर हम मौजूदा और फ़ौरी अख़राजात के लिए क़र्ज़ हासिल करने पर मजबूर हूजाएं तो इस का मतलब ये होगा कि हम अपनी आमदनी से ज़्यादा ख़र्च कर रहे हैं।

अगर हम अपनी आमदनी से ज़्यादा ख़र्च करते हैं तो हम क़र्ज़ के जाल में फंसते चले जाएंगे। उन्होंने कहा कि इक़तिसादी ख़सारा को एक काबिल-ए-क़बूल सतह तक बरक़रार रखने की ज़रूरत है और मौजूदा क़ाबिल-ए-क़बूल सतह ये है कि उसे तीन फ़ीसद तक लाया जाये। उन्होंने कहा कि अगर मईशत को बढ़ावा देते हुए इक़तिसादी ख़सारा को कम किया जाता है तो उन्हें शख़्सी तौर पर बहुत ख़ुशी होगी।

बेहतर टेक्स ढांचा भी इस में मददगार‌ साबित होसकता है और टेक्स में इज़ाफ़ा होना चाहिए। ये वाज़िह करते हुए कहा कि इक़तिसादी ख़सारा को बेहतर वसूली के ज़रिया या फिर अख़राजात में कमी करते हुए क़ाबू में किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि जब आप कम ख़र्च करेंगे तो इस से मईशत भी सुस्त होसकती है।

इसे में बेहतर यही है कि जहां मुम्किना हद तक अख़राजात को कम किया जाये वहीं मालिया वसूली में बेहतरी पैदा की जाये। उन्होंने ताहम कहा कि ऐसी सूरत-ए-हाल में जैसे 2008 – 09 के आलमी मआशी इन्हितात जैसे वक़्तों में इक़तिसादी ख़सारा को पसेपुश्त डालते हुए मईशत की रफ़्तार को बेहतर बनाने पर तवज्जो देनी पड़ती है।

उन्होंने कहा कि ये ऐसी हालात हैं जहां ख़ुद ही मआशी और इक़तिसादी ख़सारा में इज़ाफ़ा होता है। 2013 – 14 में इक़तिसादी ख़सारा 4.5 फ़ीसद रहा है जबकि साबिक़ एक साल में ये 5.8 फ़ीसद तक पहूंच गया था। गुजिश्ता तीन साल के दौरान इस में कमी आती जा रही है।

TOPPOPULARRECENT