Sunday , September 23 2018

इख़लास-ओ-अदमव इख़लास

हज़रत अनस रज़ी अल्लाहु तआला अनहु से रिवायत है कि नबी करीम स०अ०व०ने फ़रमाया जिस शख़्स की नीयत महिज़ आख़िरत की तलब हो तो अल्लाह ताआला इस के दिल को ग़नी करदेता और उस की परेशानीयों को जमा करके इत्मीनान-ए-ख़ातिर बख़्शता है।

हज़रत अनस रज़ी अल्लाहु तआला अनहु से रिवायत है कि नबी करीम स०अ०व०ने फ़रमाया जिस शख़्स की नीयत महिज़ आख़िरत की तलब हो तो अल्लाह ताआला इस के दिल को ग़नी करदेता और उस की परेशानीयों को जमा करके इत्मीनान-ए-ख़ातिर बख़्शता है।

नीज़ इस के पास दुनिया आती है, लेकिन उसकी नज़र में इस दुनिया की कोई वक़ात नहीं होती। यानी किसी भी इलमी या अमली कारे ख़ैर को इख़तियार करने के सिलसिले में जिस शख़्स की नीयत और असल मक़सद महिज़ रज़ाए मौला और सवाब आख़िरत की तलब हो तो अल्लाह ताआला उसको क़दर कि फ़ायत पर क़ाने-ओ-साबिर बनाकर और ज़्यादा तलबी की मेहनत-ओ-मशक़्क़त के कशत-ओ-रंज से बचाकर कलबी ग़िना अता करदेता है, जिस की वजह से वो इस बात से बेनियाज़ और मसतग़नाई हो जाता है कि रयाकारी के ज़रीये लोगों से माल-ओ-जाह और इज़्ज़त-ओ-मुनफ़अत हासिल करके आख़िरत का नुक़्सान-ओ-ख़ुसरान मूल ले।

नीज़ अल्लाह ताआला हुसूल मआश और ज़रूरीयाते ज़िंदगी की तकमील के सिलसिले में उनकी परेशानीयों, उलझनों और ज़हनी इंतिशार-ओ-तफ़क्कुरात को समेट कर ख़ातिर जमुई में तबदील करदेता है, बाएं तौर कि उसको ऐसी जगहों और ऐसे ज़राए से अस्बाब मईशत मुहय्या फ़र्मा देता है, जिन के बारे में उस को मालूम भी नहीं होता और इसके मुआमलात को इस तरह इस्तिवार फ़र्मा देता है कि इस का वहम-ओ-गुमान भी उस को नहीं होता, और फिर इन तमाम चीज़ों का मजमूई असर ये होता है कि उस शख़्स की नज़र में दुनिया और दुनिया भर की नेअमतें और लज़्ज़तें कोई एहमीयत नहीं रखतीं।

वो दुनिया से दामन बचाता है और दुनिया इस के क़दमों में खिंची चली आती है। उसकी ज़रूरीयाते ज़िंदगी और मईशत के वो अस्बाब जो इस के लिए मुक़द्दर हैं, बगै़र किसी मेहनत-ओ-मशक़्क़त के, बगै़र किसी सुई-ओ-कोशिश के और बगै़र किसी ज़िल्लत-ओ-ख़ारी के उस को हासिल होते रहते हैं। (तिरमिज़ी, अहमद, दारमी)

TOPPOPULARRECENT