इफ़तार तोप: रमज़ान की शादमानी और दबदबे की अलामत

इफ़तार तोप: रमज़ान की शादमानी और दबदबे की अलामत
रमज़ान उल-मुबारक में तोप के गोलों की घन गरज से तक़रीबन पूरी अरब दुनिया में वक़्त इफ़तार का इज़हार होता है।

रमज़ान उल-मुबारक में तोप के गोलों की घन गरज से तक़रीबन पूरी अरब दुनिया में वक़्त इफ़तार का इज़हार होता है।

चट्टानी पहाड़ों और फैले सहराओं के बेचों बीच दूर-ओ-नज़दीक बिखरे अरब क़बीलों के लिए ऐलाने इफ़तार की ये सहूलत पिछली कई सदियों से चली आरही है और आज डिजीटल और इलेक्ट्रॉनिक्स की बेपनाह तरक़्क़ी के बावजूद तोप-ओ-तफ़ंग से लैस ये अरब रिवायत जारी-ओ-सारी है।

तारीख लिखनेवाले उसे रमज़ान की आमद के साथ ही मुसलमानों के आंगन में उतरने वाली शादमानी के इज़हार के साथ साथ उन के इजतिमाई रोब और दबदबे की अलामत भी क़रार देते हैं।

अरब तमद्दुन और सक़ाफ़्त में अहम दर्जा पा जाने वाली ये रिवायत जदीद सहूलतों के फ़राहम हो जाने के बाद अगरचे अपने इबतिदाई बरसों के मक़ासिद पूरे तो नहीं करती लेकिन एक यादगार अलामत के तौर आज भी मक्का की पहाड़ियों से लेकर ख़लीजी ममालिक और अफ़्रीक़ी सरहदों तक मौजूद है। जदीद मक्का में मदफ़ीह की पहाड़ी पर नसब की गई तोप मक्का की क़दीम रिवायत और तरक़्क़ी का हसीन इमतिज़ाज(सुंदर उदाहण) है।

सऊदी इदारा बराए सिफ़ारती मुतालाजात में अरब की जदीद तारीख़ के प्रोफ़ेसर डा. मुहम्मद कोयदा का कहना है कि पुराने वक़्तों में तोप के गोले फ़ायर करने का तरीक़ा बवक़्त इफ़तार इसलिए राइज किया गया कि तब कलाइयों पर घड़ियां और घरों में घड़ियाल थे ना ही आवाज़ बढ़ाने वाले जदीद आलात(उपकरन) मयस्सर थे।
सहर से ग़ुरूब आफ़ताब (सूरज डूबने)तक रोज़ा रखने वालों को नमाज़ों के लिए बुलाने की ख़ातिर मक्का के मोज़न चार मीनारों से अज़ान बुलंद करते, चारों मीनारों से अज़ान की आवाज़ चारों अतराफ़ में फैलती।

प्रो कोयदा अपनी किताब मक्का में उसमानी दौर-ए-हकूमत में लिखते हैं कि मक्का में तोप के गोले से इफ़तारी का वक़्त बताने की रिवायत दौरे उसमानी में शुरू हुई और एक ऊंची पहाड़ी से तोप का गोला फ़ायर किया जाता थाता कि आवाज़ दूर तक जाये मक्का शहर के बड़े हिस्से तक ये आवाज़ पहुंच जाती थी। प्रोफ़ैसर कोयदा का कहना है कि सऊदी में इफ़तारी के वक़्त तोप का गोला फ़ायर करने की रिवायत आज भी जारी है, ताहम आज इसे जारी रखने की वजह महज़ एक रिवायत का एहतिराम है।

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