उत्तराखंड हाई कोर्ट ने खुले में कुर्बानी देने पर लगाई रोक, सिर्फ बूचड़खानों में करने की इज़ाज़त

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने खुले में कुर्बानी देने पर लगाई रोक, सिर्फ बूचड़खानों में करने की इज़ाज़त
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उत्तराखंड हाई कोर्ट ने बकरीद के मौके पर खुले में या सार्वजनिक स्थानों पर बकरे की कुर्बानी देने पर आज रोक लगा दी. मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति मनोज तिवारी की खंड पीठ ने आदेश दिया कि बकरीद के त्योहार के दौरान खुले में या सार्वजनिक स्थानों पर बकरे की कुर्बानी नहीं दी जाए और कुर्बानी सिर्फ बूचड़खानों में ही दी जानी चाहिए.

अदालत ने यह भी निर्देश दिए कि खून खुली नालियों और नालों में नहीं बहना चाहिए. अदालत ने कहा कि आदेश सबके लिए हैं भले ही वे किसी भी धर्म से हो. 22 अगस्त को पूरे देश में ईद उल अजहा मनाया जा रहा है. इस दिन मुस्लिम धर्म के लोग बकरे की कुर्बानी देते हैं.

केंद्र सरकार ने दिल्ली के अपने दफ्तरों में 23 अगस्त के बजाय 22 अगस्त को बकरीद की छुट्टी दिए जाने की घोषणा की थी. कार्मिक मंत्रालय ने कहा कि जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी की अध्यक्षता वाली मरकजी रूयत-ए-हिलाल कमेटी के अनुसार भारत के अन्य शहरों से चांद दिखने की जानकारी आई हैं. इस आधार पर फैसला किया गया है कि ईद-उल-जुहा के मौके पर केंद्र सरकार के दिल्ली में स्थित प्रशासनिक दफ्तर 23 अगस्त की जगह 22 अगस्त को बंद रहेंगे. बयान के मुताबिक, सरकार ने 14 अगस्त को जारी अपनी विज्ञप्ति को वापस ले लिया है जिसमें कहा गया था कि 23 अगस्त को ईद-उल-अजहा मनाई जाएगी.

बता दें कि अरब में दुम्बा (भेड़), ऊंट की कुर्बानी दी जाती है. जबकि भारत में बकरे, ऊंट और भैंस की कुर्बानी दी जाती है. अरब में दुम्बा की कुर्बानी का चलन शुरू हुआ. बाद में बकरे या अन्य जानवरों की भी कुर्बानी दी जाने लगी. जिन जानवरों की कुर्बानी देते हैं उसे कई दिन पहले से अच्छे से खिलाया-पिलाया जाता है. उससे लगाव किया जाता है, फिर उसी की कुर्बानी दी जाती है.

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