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उत्तरी केरल कालीकट भारत का एक मिनी अरब

हैदराबाद/रांची : भारत में मुसलमान पहली बार केरल की ज़मीन पर आए थे. तब वे व्यापार किया करते थे. ये पैगंबर मोहम्मद के जीवनकाल की ही बात है. अरब व्यापारी सातवीं और आठवीं सदी से कालीकट आने लगे थे. यहां उन्होंने स्थानीय लड़कियों से शादियां भी कीं. कालीकट में तीन प्राचीन मस्जिदें हैं. ये ग्यारहवीं और बारहवीं शताब्दी में बनाई गई थीं. उस समय अरब व्यापारी इन मस्जिदों में ही नमाज़ पढ़ा करते थे. शहर में पुराने ज़माने के तर्ज़ पर एक मुख्य क़ाज़ी हैं जिनके पूर्वज अरब से आए थे. वो आज भी अपने दफ्तर में लिखने का सारा काम अरबी में करते हैं. अभी भी उत्तरी केरल में अरब देशों से काफी लोग आते हैं. वे या तो यहाँ इत्र खरीदते हैं या फिर आयुर्वेदिक इलाज के लिए आते हैं. इस तरह अरब और केरल का रिश्ता सदियों पुराना है. अरब देशों की संस्कृति का यहाँ की मुस्लिम आबादी पर सकारात्मक असर भी पड़ा है.

उत्तरी केरल के कुछ बड़े बाज़ार को देख कर लगता है कि ये अरब देशों के बाज़ार हैं. कालीकट का सबसे बड़ा बाज़ार और इसकी दुकानें अक्सर खरीदारों से भरी रहती हैं. इसकी जामा मस्जिद में नमाज़ियों की संख्या अच्छी-खासी होती है. मस्जिद के ऊंची मीनार हो या दुकानों के अरब शैली में लिखे नाम या फिर सड़क पर चलती बुर्कानशीं औरतें, माहौल किसी अरब देश जैसा लगता है. उत्तरी केरल के हर घर का कोई एक शख्स खाड़ी और अरब देशों में नौकरी ज़रूर करता है और पैसे घर भेजता है.

हज़ारों की संख्या में यहाँ से अरब गए लोग वापस भी लौट चुके हैं. वो अपने साथ अरब संस्कृति का थोड़ा असर भी लेकर लौटते हैं. उनका खाना-पीना और रहन-सहन कुछ हद तक अरबों जैसा हो जाता है. इस कारण केरल में नए रेस्तरां खुल रहे हैं जहाँ अरबी खाने परोसे जाते हैं. यहां अरबी खाने बहुत लोकप्रिय हैं.

यहां एक ‘मजलिस’ है जो एक साल पहले खुला था और जहाँ केवल अरब और केरल की स्थानीय परंपरा के व्यंजन परोसे जाते हैं. अरब डिश ‘मंदी’ यहाँ काफी लोकप्रिय है. अरब देशों से लौटे केरल के लोग अरबी खाना पसंद करते हैं बल्कि वो अरब रेस्तरां भी खोल रहे हैं. कालीकट के बाज़ार को एक बार नजर दौड़ाएं तो अरब देशों जैसा माहौल ही लगेगा .इस लिहाज से उत्तरी केरल के कालीकट को अगर मिनी अरब कहा जाए तो ग़लत न होगा.

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