Thursday , December 14 2017

उत्तर प्रदेश में उर्दू को दूसरी सरकारी ज़ुबान के तौर पर मंजूरी

हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में उर्दू को सरकारी कामकाज की दूसरी ज़ुबान ऐलान करने के फैसले पर आज अपनी कुबूलियत की मुहर लगाते हुए कहा कि इस मुल्क के लिसानी कानून (Linguistic)सख्त नहीं बल्कि लिसानी सेक्युलरिज़म (Secularism) का टार्गे हासिल करने के.लिय

हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में उर्दू को सरकारी कामकाज की दूसरी ज़ुबान ऐलान करने के फैसले पर आज अपनी कुबूलियत की मुहर लगाते हुए कहा कि इस मुल्क के लिसानी कानून (Linguistic)सख्त नहीं बल्कि लिसानी सेक्युलरिज़म (Secularism) का टार्गे हासिल करने के.लिये एतेदाल पसंद हैं।
चीफ जस्टिस आरएम लोढा की सदारत वाली पांच रूकनी आईनी बेंच ने उप्र हिन्दी अदीब कांफ्रेंस की अपील पर कहा कि आईन में ऐसा कुछ नहीं है जो रियासत में हिन्दी के इलावा एक या उससे ज़्यादा ज़ुबानो के इस्तेमाल के ऐलान करने से रियासत की हुकूमत को रोकता है।

आईनी बेंच ने उर्दू को रियासत में दूसरी सरकारी ज़ुबान का दर्जा देने वाले उत्तर प्रदेश सरकारी भाषा (संशोधन) कानून 1989 को जायज़ ठहराया ।

आईनी बेंच ने कहा कि किसी रियासत की सरकारी ज़ुबान या ज़ुबानो से मुताल्लिक आर्टीकल345 में ऐसा कुछ नहीं है जो हिन्दी के इलावा रियासत में एक या ज़्यादा ज़ुबानो को दूसरी ज़ुबान ऐलान करने से रोकता है। आईनी बेंच के दिगर मेम्बरों में जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस मदन बी लोकूर, जस्टिस कुरियन जोसेफ और जस्टिस एसए बोबडे शामिल थे।

आली अदालत ने कहा कि बिहार, हरियाणा, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली जैसे कई रियासत के विधानमंडलों ने हिन्दी के इलावा दूसरी ज़ुबानों को भी सरकारी कामकाज की ज़ुबान के तौर पर तस्लीम किया है । अदालत ने कहा कि अगर आईन इसकी इजाजत नहीं देता तो ऐसा मुम्किन नहीं हो पाता। दिल्ली में हिन्दी के साथ ही पंजाब और उर्दू को दूसरी सरकारी कामकाज की ज़ुबान के तौर पर तस्लीम किया गया है। आईनी बेंच ने कहा कि हिन्दी को वाजेह तौर से या अलग से रियासत में सरकारी ज़ुबान के तौर पर अपनाये जाने का जिक्र होने की वजह से उसे नहीं लगता कि आईन किसी दूसरी ज़ुबान को सरकारी ज़ुबान के तौर पर अपनाने के लिये असेम्बली (विधानमंडल) के इख्तेयारात को बंद करता है।

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