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उमर क़ैद की तकमील के बावजूद कई क़ैदी रिहाई से महरूम

हैदराबाद, ०४ दिसम्बर: ( सियासत न्यूज़ ) मुल़्क की मुख़्तलिफ़ जेलों में उम्र क़ैद और ज़ेर दरयाफ़त क़ैदीयाँ बरसों से मुक़य्यद हैं और आबादी के तनासुब से उन क़ैदीयों में अक्सरीयत मुस्लमानों की है ।

हैदराबाद, ०४ दिसम्बर: ( सियासत न्यूज़ ) मुल़्क की मुख़्तलिफ़ जेलों में उम्र क़ैद और ज़ेर दरयाफ़त क़ैदीयाँ बरसों से मुक़य्यद हैं और आबादी के तनासुब से उन क़ैदीयों में अक्सरीयत मुस्लमानों की है ।

इस सिलसिला में जस्टिस राजिंदर सच्चर कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में वाज़िह तौर पर इस बात को पेश किया है । अक्सर मुस्लमान क़ैदीयों पर कुछ संगीन और कुछ मामूली किस्म के मुक़द्दमात दर्ज हैं । इन में से बहुत सारे क़ैदीयाँ इतने ग़रीब हैं कि वाह अपनी ज़मानत की तकमील के लिए वकील की ख़िदमात और दीगर अख़राजात की तकमील के मुतहम्मिल भी नहीं हैं ।

अक्सर क़ैदी ज़मानत के हुसूल से मुताल्लिक़ कोई इलम भी नहीं रखते ताहम हुकूमत की जानिब से हर साल 26 जनवरी यानी यौम जमहूरीया के मौक़ा पर उम्र क़ैद की सज़ा मुकम्मल करने वालों को आम माफ़ी देते हुए रिहा कर देती है बाअज़ दफ़ा ऐसे क़ैदीयों को क़ानूनी पेचीदगीयों का सामना करना पड़ता है ।

ऐसे में वो आम माफ़ी से महरूम हो जाते हैं। क़ैदीयों को अपनों से बिछड़ने और आज़ाद ज़िंदगी गुज़ारने की देरीना ख़ाहिश सताती रहती है और उन को इस बात का एहसास जगाता रहता है कि वो कभी ना कभी हुकूमत की आम माफ़ी के बाद आज़ाद हो जाएंगे और ख़ुशी ख़ुशी घर जाऐंगे ।

कई क़ैदी उम्र क़ैद की सज़ा मुकम्मल होने के बावजूद अभी भी जेलों में अपनी रिहाई के मुंतज़िर हैं ।

अब जबकि 26 जनवरी 2012यौम जमहूरीया बिलकुल क़रीब है ऐसे में उन के अंदर इस बात का तजस्सुस पैदा हो गया है कि शायद उन्हें आइन्दा साल आम माफ़ी मिलेगी और वो अपने घरों को वापिस जाऐंगे ।

जनाब ज़हीर उद्दीन अली ख़ां को चेर्लापल्ली जेल में मुक़य्यद उम्र क़ैद को मुकम्मल करने वाले क़ैदीयों ने एक फ़र्यादी मकतूब रवाना करते हुए इस बात की ख़ाहिश की कि वो यौम जमहूरीया के मौक़ा पर उन की रिहाई केलिए हुकूमत को तवज्जा दिलाएं ।

उन्होंने अपने मकतूब में बताया कि गुज़शता दो साल के दौरान क़ानूनी पेचीदगीयों की वजह से उन्हें रिहाई नहीं मिली । जिन में अक्सर क़ैदी 13 ता 15 साल क़ैद बामुशक़क़्त और रीमीशन के साथ 16 ता 20 साल उम्र क़ैद की मुद्दत मुकम्मल करलीए ।

जबकि आम तौर पर होता ये हीका 7 साल की क़ैद बामुशक़क़्त और रीमीशन के 3 साल इस तरह जुमला 10 साल और 7 साल क़ैद बामुशक़क़्त के बाद 3 साल रीमीशन के बगै़र क़ैदीयों को आम माफ़ी देती है लेकिन उन की मुक़र्ररा मुद्दत मुकम्मल होने के बावजूद ऐसे क़ैदीयों की रिहाई में टाल मटोल की पालिसी इख़तियार की जा रही है ।

उन्होंने ख़ाहिश की कि हुकूमत उन की रिहाई को मुम्किन बनाने के लिए क़ानून और क़वाइद में तरमीम करते हुए नरमी लाएंगे ।

क़ैदीयों ने अपने फ़र्यादी ख़त में मज़ीद कहा कि दो तीन और पाँच मर्तबा उम्र क़ैद की सज़ा होने और उन पर 40 ता 50 या फिर 100 मुक़द्दमात या फिर संगीन फ़र्द-ए-जुर्म या फिर बड़ा सा बड़ा सैक्शन भी दर्ज होतो भी उन्हें रन कांक्रीट के तहत एक ही जुर्म के ज़मुरा में शामिल करते हुए उन्हें रिहा करना काबिल-ए-सिताइश है ।

दूसरी तरफ़ हम पर आइद दफ़आत जैसे 224 98(A) 76 और दीगर कई दफ़आत के तहत सज़ा की तकमील बहुत पहले ही होचुकी है इस के बावजूद हम को रिहा ना करने की वजह से ज़हनी तनाव का शिकार हैं बल्कि ज़हनी इंतिशार से भी मुतास्सिर हो रहे हैं ।

ऐसा मालूम होता है कि हम को एक ही जुर्म के तहत एक सज़ा के बजाय दो तीन जुर्मों की सज़ाएं दी जा रही हैं । अगरचे कि क़ैदी आम माफ़ी के मुस्तहिक़ हैं लेकिन बाअज़ क़ानूनी पेचीदगीयों के बाइस रिहाई से महरूम हैं ।

हमारे साथ ना इंसाफ़ी की जा रही है । माज़ी में आम माफ़ी के मौक़ा पर रिहाई से महरूम क़ैदीयों के वालदैन अफ़राद ख़ानदान बिलख़सूस बीवी और बच्चे दरबदर की ठोकरें खा कर समाज के चंद गोशों से तानों का शिकार हो गए और बाअज़ अफ़राद ख़ानदान ज़िल्लत और रुसवाई से बदज़न होकर इस दुनिया से ख़ैर बाद कर गए ।

हम (क़ैदी ) आज़ाद दुनिया से बिछड़ने का ग़म लेकर जेल में क़ैद-ओ-बंद की ज़िंदगी गुज़ारने पर मजबूर हैं । हम को क़ैद की सज़ा से हमारे अफ़राद ख़ानदान असासा जात मकानात से ना सिर्फ होगए हैं बल्कि कसमपुर्सी की ज़िंदगी गुज़ारने पर मजबूर हैं ।

इन को ज़िंदगी गुज़ारने की कोई तमानीयत नहीं है । इस तरह हमारे ख़ानदान का दायरा एक तरह से तंग होकर रह गया है ।

बाअज़ क़ैदी ऐसे भी हैं जिन की शादी ब्याह हुए चंद माह भी ना गुज़रे थे कि जुर्म के इल्ज़ाम में गिरफ़्तार किए गए और अपनी नई नवेली दुल्हनों को छोड़कर जेल की सज़ा काटने पहूंच गए ।

बाअज़ क़ैदीयाँ ऐसे भी हैं जिन की बीवीयां हामिला थीं और अब उन के बच्चे बड़े होकर अपने वालिद से मुलाक़ात के मुश्ताक़ हैं ।

बाअज़ बच्चे वालदैन को रखते हुए भी यतीम-ओ-यसीर की ज़िंदगी गुज़ारने पर मजबूर हैं । मुजाहिदीन आज़ादी और बड़े बड़े क़ौमी क़ाइदीन जैसे महात्मा गांधी अपनी अहलिया मुहतरमा कस्तूर बाई और बच्चों हरी लाल गांधी मनी लाल गांधी राम दास गांधी को छोड़कर जेल में पाँचता 6 साल की ज़िंदगी गुज़ार दी इस दौरान महात्मा गांधी ने अपने साथी क़ैदीयों की हिम्मत बढ़ाते हुए कहा था कि किसी भी क़ैदी को पाँच साल से ज़ाइद क़ैद की ज़िंदगी नहीं होनी चाहीए अगर इस से ज़ाइद का अर्सा गुज़र जाय तो क़ैदी में बग़ावत के इमकान पैदा होते हैं ।

जबकि क़ैदीयों की हालात को मद्द-ए-नज़र रखते हुए हुकूमत आंधरा प्रदेश ने 15 अगस्त 2004 को एक जी ओ ऐम ऐस नंबर 190जारी किया था । जिस के तहत सैंकड़ों क़ैदीयों को रिहा किया गया था लेकिन बाअज़ क़ैदी रिहाई से महरूम हो गए । लिहाज़ा हम रियास्ती हुकूमत से दरख़ास्त करते हैं कि 26 जनवरी 2012 (यौम जमहूरीया ) के मौक़ा पर हमें आम माफ़ी देते हुए रहा करदें जिस के वो ममनून-ओ-मशकूर रहेंगे ।

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