Wednesday , November 22 2017
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उर्दू के मशहूर शाइर का इंतिक़ाल, नहीं रहे मलिक ज़ादा मंज़ूर

मलिक ज़ादा मंज़ूर का फ़ाइल फ़ोटो (फूलों की माला के साथ)

“अगर ये राह में बूढा शजर नहीं होता,
शदीद धूप में मुझसे सफ़र नहीं होता”

इस शे’र के ख़ालिक़ मशहूर शा’इर मलिकजादा मंजूर अहमद का आज निधन हो गया। वह करीब 90 साल के थे। परिवार के सूत्रों ने बताया कि अहमद दिल के मरीज थे और उन्हें तीन दिन पहले लखनऊ के खुर्रमनगर स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शुक्रवार दोपहर दो बजकर दो मिनट पर उनकी सांसों की डोर टूट गयी। उनके परिवार में पत्नी, दो बेटे तथा छह बेटियां हैं। अम्बेडकरनगर में किछौछा के पास स्थित गिदहुड़ गांव में 17 अक्तूबर 1926 को जन्मे अहमद ने गोरखपुर में शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने आजमगढ़ स्थित शिबली कालेज में 13 साल तक अंग्रेजी के शिक्षक के तौर पर काम किया। कुछ अन्य स्थानों पर अध्यापन के बाद वह लखनऊ विश्वविद्यालय में करीब 12 साल तक प्रोफेसर रहे। देश-विदेश में मुशायरों की बेहतरीन निजामत के लिये मशहूर अहमद ने हिन्दुस्तान के अनेक शहरों के साथ-साथ सउदी अरब, अमेरिका, कनाडा, ईरान, ओमान, कतर, पाकिस्तान समेत कई मुल्कों के सैकड़ों मुशायरों में शिरकत की। उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी के अध्यक्ष रह चुके अहमद ने अनेक रौशन कृतियां दीं। उर्दू का मसला, कॉलेज गर्ल, शहर-ए-सितम, रक्स-ए-शरार, शेर-ओ-अदब, मौलाना आजाद-अल हिलाल के आईने में, अबुल कलाम आजाद-फिक्र-ओ-फ़न उनकी कुछ चुनिन्दा व मशहूर रचनाएं हैं।

(भाषा)

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