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उर्दू यूनीवर्सिटी में ग़ैर उर्दू दां असातिज़ा की भरमार

मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनीवर्सिटी में तक़र्रुरात के सिलसिले में की गई बेक़ाईदगियों का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि तक़र्रुरात के सिलसिले में टीचिंग स्टाफ़ के लिए उर्दू से लाज़िमी वाक़फ़ीयत की शर्त को नजरअंदाज़ करते हुए बड़े पैमाने पर तक़र्रुरात किए गए हैं।

यूनीवर्सिटी के ज़राए के मुताबिक़ गुज़िश्ता चंद बरसों में टीचिंग स्टाफ़ के जो तक़र्रुरात अमल में लाए गए इन में 200 अफ़राद ऐसे हैं जिसे उर्दू सही से नहीं आती । यूनीवर्सिटी की जानिब से एसोसीएट प्रोफ़ेसर, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, असिस्टेंट डायरेक्टर्स की जो तफ़सीलात सियासत को हासिल हुई हैं इन में 35 से ज़ाइद ऐसे अफ़राद हैं जो यक़ीनी तौर पर उर्दू से नावाक़िफ़ हैं लेकिन इस तरह के अफ़राद के 2004 से तक़र्रुरात जारी हैं।

यूनीवर्सिटी के क़्वाइद के मुताबिक़ टीचिंग स्टाफ़ के लिए उर्दू का जानना ज़रूरी है जिन में उर्दू पढ़ना और लिखना लाज़िमी है क्योंकि उन्हें तलबा को उर्दू में ही लेक्चर देना होता है लेकिन यूनीवर्सिटी के हुक्काम तमाम क़्वाइद को बालाए ताक़ रखते हुए ग़ैर उर्दू दां अफ़राद का तक़र्रुर किया और उर्दू ज़बान और यूनीवर्सिटी से नाइंसाफ़ी के मुर्तक़िब हुए।

उन्हों ने बताया कि तक़र्रुरात में की गई बेक़ाईदगियों पर पर्दा डालने के लिए यूनीवर्सिटी को सिर्फ़ मख़सूस कोर्सेस और फासलाती तालीम तक महदूद कर दिया गया है जबकि कैंपस एजूकेशन के बगै़र कोई भी यूनीवर्सिटी मुकम्मल यूनीवर्सिटी कहलाई नहीं जा सकती।

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