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उर्दू ज़बान को किसी मज़हब के साथ जोड़ना सरासर ना इंसाफ़ी:नज्म हेप्तुल्लाह

नई दिल्ली 07 फरवरी:उर्दू को हिन्दुस्तान की ज़बान क़रार देते हुए अक़लियती उमूर की मर्कज़ी वज़ीर नज्म हेप्तुल्लाह ने कहा कि ज़बान को किसी मज़हब से जोड़ना इस ज़बान के साथ सरासर नाइंसाफ़ी है। उन्होंने क़ौमी उर्दू कौंसिल बराए फ़रोग़ उर्दू ज़बान की आलमी कांफ्रेंस के इफ़्तेताही मीटिंग से मुख़ातिब किया। ये कांफ्रेंस उर्दू सहाफ़त के दो साल मुकम्मिल होने के मौके पर हो रही है।

उन्होंने कहा कि उर्दू ज़बान की परवरिश उसी मुल्क और गंगा जमुनी तहज़ीब में हुई है। जो उसे मुसलमानों की ज़बान क़रार दे रहे हैं वो उर्दू ज़बान के साथ नाइंसाफ़ी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ज़बान मुल्क-ओ-क़ौम की अमानत होती है किसी फ़िर्क़ा का इस पर हक़ हरगिज़ नहीं होती है।नज्म हेप्तुल्लाह ने कहा कि जमहूरी मुल्क में ज़बान और क़लम को इस लिए आज़ादी हासिल होती है ताकि वो सही रास्ता दिखा सके और इस सिलसिले में एक मेकानिज़म तैयार करने की ज़रूरत है जिससे ये अंदाज़ा लगाया जा सकता कि ये सही रास्ता चल रहा है।

उन्होंने कहा कि एक ग़लत ख़बर से अवाम का एक बड़ा तबक़ा असर-अंदाज़ हो सकता है। इस लिए अख़बार वालों की ज़िम्मेदारी है कि ख़बर देते वक़्त इस बात का ख़ास ख़्याल रखें इस से किसी तबक़ा की हक़तलफ़ी तो नहीं होगी। उन्होंने कहा कि उर्दू ज़बान इस लिए ज़िंदा है क्युं कि ये अवाम की ज़बान है और इस में जितनी गहराई है उतनी किसी ज़बान में नहीं है।

उन्होंने कहा कि उर्दू ज़बान में बड़ी ताक़त है वो मसाइल-ओ-मुश्किलात के दौर भी ज़िंदा रहने की सलाहीयत रखती है ।क़ौमी कौंसिल के डायरेक्टर प्रोफेसर मुर्तज़ा करीम ने उर्दू सहाफ़त के मौजूदा सूरत-ए-हाल का तज़किरा करते हुए कहा कि उसे ज़र्द सहाफ़त से बचना और बचाना ज़रूरी है।

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