Wednesday , December 13 2017

उस्मानिया जनरल हॉस्पिटल की बुलंदी पर नसब 88 साला क़दीम उर्दू तख़्ती गिरने के क़रीब

हवा , पानी , धूप , छाओं , मौसम , ग़ुर्बत , मुसीबत , मुहब्बत , मुरव्वत , हमदर्दी , इंसानियत , ज़बान और बीमारीयों का कोई मज़हब नहीं होता।

हवा , पानी , धूप , छाओं , मौसम , ग़ुर्बत , मुसीबत , मुहब्बत , मुरव्वत , हमदर्दी , इंसानियत , ज़बान और बीमारीयों का कोई मज़हब नहीं होता।

लेकिन फिर्कापरस्त चाहें तो इन सब को किसी भी मज़हब से जोड़ कर इंसानों और इंसानियत से दुश्मनी करने लगते हैं । 1926 में 25 लाख रुपये की लागत से आसिफ़ साबह नवाब मीर उसमान अली ख़ां सिद्दीक़ी बहादुर ने अज़ीमुश्शान उस्मानिया जनरल हॉस्पिटल तामीर करवाया था और उस ज़माने में उसे एशिया का सब से बड़ा हॉस्पिटल कहा जाने लगा था।

आसिफ़ साबह ने ये हॉस्पिटल सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी रियाया की तिब्बी ज़रूरीयात के पेशे नज़र क़ायम किया था । इन का यही नज़रिया था कि बीमारी, ग़ुर्बत और मुसीबत का कोई मज़हब नहीं होता और ना ही किसी ज़बान को मज़हब से जोड़ा जा सकता है।

उस्मानिया जनरल हॉस्पिटल की इस अंदाज़ में तामीर की गई कि इस इमारत का शुमार एशीया में फ़न तामीर की शाहकार इमारतों में होने लगा लेकिन अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि सुकूत हैदराबाद के बाद उस्मानिया जनरल हॉस्पिटल को सिर्फ़ इस लिए तास्सुब का निशाना बनाया गया क्युंकि ये आसिफ़ जाहि हुकमरानों की इंसानियत नवाज़ी की अलामत है। यही वजह है कि हुकूमतों और ओहदेदारों ने इस हॉस्पिटल को हमेशा नज़रअंदाज क्या।

सब से अहम बात ये है कि इस तारीख़ी हॉस्पिटल की बुलंदी पर नसब करदा उर्दू तख़्ती को तबाही के लिए छोड़ दिया गया। आज हम ने इस तख़्ती का जायज़ा लिया जिस पर अंदाज़ा हुआ कि मुतअस्सिब ज़हनोंने जिस तरह उर्दू को नज़रअंदाज करते हुए उसकी एहमीयत को घटाने की कोशिश की है इसी तरह उस्मानिया जनरल हॉस्पिटल की क़दीम उर्दू तख़्ती को भी सफ़ा हस्ती से मिटाने का फैस्ला करलिया है।

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