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एक अलीग द्वारा ज़फर सरेशवाला साहब के नाम खुला खत !

जनाब जफर सरेशवाला साहब,
अस्सलाम ओ अलैकुम !

पिछले दिनों आप का एक बयान आया था कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का अल्पसंख्यक का दर्जा खत्म होने के लिए मुसलमान जिम्मेदार है ! मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि इसमे मुसलमान कैसे जिम्मेदार हो सकता है ! काफी आत्म मंथन करने के बाद एक “अलीग” होने के नाते मुझे लगा की आप को एक खुला खत लिखना चाहिए ताकि आप को और इस खत को पढ़ने वाले पाठक को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी हो सके !

सबसे पहले आप के द्वारा दिया गया बयान से मैं इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता हूँ ! आप एक यूनिवर्सिटी चलाते है इसलिए आप इस बात से ज़रूर सहमत होंगे की अल्पसंख्यक संस्थान का दर्ज़ा ख़त्म करना या ना करना भारत सरकार के अधिकार क्षेत्र में होता है ! इसमे मुस्लिम समुदाय को जिम्मेदार ठहराना आप की मानसिक दिवालियापन को दर्शाता है ! जनाब, आप अपने स्तरहीन और बिना सर पैर के बयान से मुस्लिम समाज को बरगला नहीं सकते लेकिन अपने आपको को एक वर्ग विशेष की नज़र में सर्वश्रेष्ट वफादार होने का सबूत ज़रूर दे चुके है !

जफर सरेशवाला साहब, आप की जानकारी के लिए बता दूं की 1875 में मोहम्डन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज की अस्थापना और 1920 में सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्ज़ा प्राप्त करने के बाद से लेकर आज तक ज़मीनी स्तर पर इसकी पहचान एक सेक्युलर संस्थान की रही है और इंशा अल्लाह हमेशा रहेगी ! यहाँ जाती, धर्म, रंग और लिंग में भेद की कोई जगह नहीं रही बल्कि इनसब चीज़ों से ऊपर उठ कर आगे बढ़ने का सन्देश संस्थान हमेशा देती रही है ! आप के साथ साथ बहुत कम लोगों को जानकारी होगा कि यूनिवर्सिटी का पहला ग्रेजुएट कोई और नहीं ईश्वरी प्रसाद है जो एक हिन्दू था जिन्होंने आगे चलकर महान इतिहासकार के तौर पर भारत और विश्व में अपना स्थान बना कर नाम कमाया !

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से फारिग होकर निकलने वाला हरेक स्टूडेंट हिन्दू मुस्लिम से कही ऊपर उठ कर अपने आप को “Alig” कहलाना पसंद करता है ! “अलीग” तहजीब के साथ साथ एक विचारधारा है जो सेक्युलर एवं देशभक्ति का संगम है ! यूनिवर्सिटी से यह अनमोल तोहफा लेकर निकलने वाला हर तलबा अपनी निजी ज़िन्दगी में जाइज़ हक़ पर लड़ने वाला योद्धा होता है ! चाहे सामने राजा हो या रंक उसके सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता ! मुझे गर्व है की मैं एक “अलीग” हूँ !

धन्यवाद !!

आप का एक शुभचिंतक !

अकबर सिद्दीक़

(लेखक के विचार निजी हैं)

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