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एक आग से गुज़रे तो समुंद्र पार हुआ

हंगरी की सरहद से मुत्तसिल सरब इलाक़े में एक वाइनयार्ड के एक दरख़्त के नीचे लेटा मुहम्मद अल्हाज माज़ी की यादों में खोया रहता था। फिर एक रात उसने तमाम सरहदी रुकावटों को उबूर करते हुए हंगरी में दाख़िल होने की कोशिश की।

वो बुनियादी तौर पर एक बर्रे आज़म से दूसरे में पहुंचना चाहता था और ये कोशिश उस की ज़िंदगी को बदल कर रख सकती थी। मुहम्मद की सोचें किसी तेज़ रफ़्तार ट्रेन की तरह चल रही थीं। कई तरह के ख़ौफ़ उस के दिल की धड़कन के साथ धक धक कर रहे थे।

उसने कभी सोचा भी ना था कि उसे ऐसे हालात का सामना भी करना पड़ सकता है। शामी ख़ानाजंगी ने छब्बीस साला मुहम्मद को मजबूर किया कि वो पुरअमन ज़िंदगी की ख़ातिर एक मुश्किल और दुश्वार गुज़ार रास्ता अख़तियार करे। मुहम्मद बख़ूबी जानता था कि बहिरा अजीवन को उबूर करने की कोशिश में कई मुहाजिरीन हलाक हो चुके हैं।

मुहम्मद को मालूम था कि सूरज की शदीद तपिश, बारिश, कीचड़ से भरे रास्ते, खचा खच भरे रेलवे स्टेशन और बसों की तवील मुसाफ़त, ये सब मसाइब उस के मुंतज़िर हैं लेकिन वो फिर भी क़ाइल था कि उसे हिम्मत नहीं हारना थी।

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