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एक कमरा में पूरा स्कूल, जहांनुमा गर्वनमैंट स्कूल में अव्वलता पंजुम तमाम जमातें

(नुमाइंदा ख़ुसूसी) इन्फ़ार्मेशन टैक्नालोजी में हिंदूस्तान भर में अहम टैक्नालोजी का मर्कज़ हमारे शहर हैदराबाद में सरकारी मदारिस का कितना बुरा हाल है । इस बात को तहरीर में लाना भी मुश्किल है । एक छोटे से कमरा मैं 67 तलबा तालिबात ज़ेर-

(नुमाइंदा ख़ुसूसी) इन्फ़ार्मेशन टैक्नालोजी में हिंदूस्तान भर में अहम टैक्नालोजी का मर्कज़ हमारे शहर हैदराबाद में सरकारी मदारिस का कितना बुरा हाल है । इस बात को तहरीर में लाना भी मुश्किल है । एक छोटे से कमरा मैं 67 तलबा तालिबात ज़ेर-ए-तालीम हैं ।

तफ़सीलात के मुताबिक़ मुस्लिम अक़ल्लीयत वाले जहांनुमा इलाक़ा में वाक़्य ये स्कूल 2002 से एक ही कमरा में चल रहा है । इसी एक कमरा में जमात अव्वल से जमात पंजुम तक क्लासेस चलाई जाती हैं। लेकिन हर साल तलबा की तादाद में कमी हो रही है । सरकारी मदारिस के मुताल्लिक़ महिकमा और हमारी अवाम दोस्त हुकूमत की ग़फ़लत-ओ-लापरवाही का आलम ये है कि इस एक कमरा वाले स्कूल का माहाना किराया जो 1085 रुपय है लेकिन वक़्त पर ये भी अदा नहीं किया जाता ।

साल 2009 में इस वक़्त के कुलैक्टर हैदराबाद नवीन मित्तल जब इस स्कूल का दौरा किया था तो ख़ुद उन्हें ताज्जुब हुआ था कि किस तरह से एक ही कमरा में 5 क्लासेस चलाई जाती हैं । दौरा के बाद मीडीया से बचने के वो किसी तरह से निकल गए थे ।

आज हम ने भी इस स्कूल का मुआइना क्या । क्योंकि एक मासूम तालिबा के सरपरस्त ने तवज्जा दिलाई थी हम ये लिखने के मौक़िफ़ में हैं हम ने आज तक ऐसी बदतरीन हालत में कोई स्कूल नहीं देखा 67 तलबा और 3 टीचरों के लिए एक बैत-उल-ख़ला भी नहीं है । गर्वनमैंट जहांनुमा प्राइमरी स्कूल तंग-ओ-तारीक गली में वाक़्य है जहां एक मोटर सैक़ल भी नहीं जा सकती है ।

क्या इस क़दर तंग-ओ-तारीक मुक़ाम पर स्कूल होसकता है । स्कूल में एक टीचर है जिन्हों ने अपनी तनख़्वाह के पैसों से एक बोर्ड बनाया है । इस के इलावा फ़र्श के कुछ हिस्सा पर समनट से काम भी किराया क्यों कि अगर वो भी ऐसा ना करते तो बाक़ी तलबा स्कूल ही नहीं आते । क्यों कि फ़र्श जगह जगह टूट गया है । इस में सूराख़ होगए हैं जिन में घौंस निकलती है और बच्चे इस से डरते हैं जो बिलकुल फ़ित्री बात है । यहां दो टीचर्स हैं जो विद्या वालीनटर के तहत हैं जिन की तनख़्वाह पिछले 3 माह से अदा नहीं की गई । टीचर के लिए तक कुर्सी नहीं है ।

ज़मीन पर बैठ कर तालीम दे रहे हैं और तलबा तालीम हासिल कररहे हैं । एक कमरा नाकाफ़ी होरहा है । बच्चे एक दूसरे से चिमट कर तकलीफ़ के साथ बैठे हैं । अपने अपने बयाग गोद में लिए घंटों पेशाब को रोक कर एक दूसरे की पीठ से पीठ लगी होती है । कोई तो टीचर के टेबल के नीचे पनाह लेता है इन बच्चों की हालत देख कर ऐसा लगता है उन्हें अपनी ग़ुर्बत और बदहाली के जुर्म की सज़ा दी जा रही है ।

तालीम के ख़ाहां ये बच्चे एक तरह से स्कूल जाकर रोज़ाना थर्ड डिग्री जैसे सुलूक से दो-चार हैं । एक बच्चे के वालिद ने कहा कि हमारे दिल में ये ख़ाहिश होती है कि किस तरह मेरा बेटा और दूसरे तमाम बच्चे पढ़ लिख कर ग़ुर्बत की इस चादर को फाड़ डालें और ख़ानदान को जहालत की तारीकी से निकाल लें । और ख़ानदान को इलम-ओ-तरक़्क़ी के इस क़िला में दाख़िल करदें जहां सिर्फ रोशनी ही रोशनी हो लेकिन क्या करें हम अपने बच्चों को ख़ानगी स्कूल में दाख़िल नहीं करसकते इस लिए सरकारी स्कूल में भर्ती कराते हैं । अफ़सोस इस बात का है कि ऐसे सरकारी स्कूल में हमारे बच्चे पढ़ रहे हैं जहां 5जमातों के तलबा सिर्फ एक तंग-ओ-तारीक कमरा में तालीम हासिल कर रहे हैं ।

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