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एग्रीकल्चर यूनीवर्सिटी में दो मसाजिद गैर आबाद

नुमाइंदा ख़ुसूसी- ज़ू पार्क , बहादुर पूरा से बमुश्किल 5 कीलो मीटर के फ़ासिला पर राजिंदर नगर में वाक़ै एग्रीकल्चर यूनीवर्सिटी जो 5500 एकड़ रकबा पर मुहीत(फैला हुआ) है इस यूनीवर्सिटी में दो मसाजिद गैर आबाद हैं । हैदराबाद जिस का पूरी दुन

नुमाइंदा ख़ुसूसी- ज़ू पार्क , बहादुर पूरा से बमुश्किल 5 कीलो मीटर के फ़ासिला पर राजिंदर नगर में वाक़ै एग्रीकल्चर यूनीवर्सिटी जो 5500 एकड़ रकबा पर मुहीत(फैला हुआ) है इस यूनीवर्सिटी में दो मसाजिद गैर आबाद हैं । हैदराबाद जिस का पूरी दुनिया में एक अलग तसव्वुर है । ये मीनारों का शहर , मसाजिद-ओ-मदारिस और आस्तानों का शहर , इस्लाम की तस्वीर पेश करने वाले इस शहर के मुस्लमानों पर ताज्जुब , हैरत और अफ़सोस है कि इन गैर आबाद दो मसाजिद की बाज़याबी(वापसी) के लिये आज तक किसी हैदराबादी ने कोई कोशिश नहीं की ।

हम ने बड़ों से सुना है कि जब मसाजिद वीरान हो जाती हैं , रुकू-ओ-सुजूद से ख़ाली हो जाती हैं इन में अज़ानें और नमाज़ें क़ायम नहीं की जातीं तो वो रोती हैं , जिन की रोने की आवाज़ आसमान वाला सुनता है , मेरे प्यारे शहर के मुस्लमानों आप बताओ कि मसाजिद की इस हालत-ए-ज़ार का ज़िम्मेदार कौन है और इस का वबाल किस पर आएगा ।

ताज्जुब है कि इन गैर आबाद मसाजिद की आबादकारी के लिये जो हज़रात कोशिश कर रहे हैं इन का ताल्लुक़ हैदराबाद से नहीं है यानी इस यूनीवर्सिटी में ज़ेर तालीम वो मुस्लिम तलबा जिन का ताल्लुक़ दीगर (दूसरे) मुक़ामात से है इन में इन दोनों मसाजिद की आबाद कारी के बारे में काफ़ी फ़िक्र पाई जाती है । ये तलबा बेहद कोशां हैं कि किस तरह अल्लाह के इन घरों को आबाद किया जाय ।

वाज़ेह रहे कि इस अज़ीम यूनीवर्सिटी के अहाते में दो क़दीम मसाजिदमें एक क़ुतुब शाही मस्जिद है और एक बुख़ारी मस्जिद , जिस की बुनियाद 3 मार्च 1977 में मौलाना अबदुल वहाब बुख़ारी ने रखी थी । क़ुतुब शाही मस्जिद , यूनीवर्सिटी के हॉस्टल कृषि नीलाइम के अंदर वाक़ै है । जो बी बलॉक में है । इस हॉस्टल की तामीर 20 मार्च 1996 के रोज़ अव्वल से ही इस मस्जिद में नमाज़ बंद करदी गई है लेकिन मस्जिद की तक़रीबन 1500 गज़ अराज़ी अभी तक अल्हम्दुलिल्ला महफ़ूज़ है ।

ये दोनों मसाजिदनिहायत मज़बूत-ओ-मुस्तहकम और खुली जगह में वाक़ै है । सिर्फ साफ़ सफ़ाई की ज़रूरत है लेकिन अफ़सोस कि इन दोनों मसाजिद में नमाज़ की अदाएगी पर पाबंदी है जिस की वजह से आज ये आलम है कि अल्लाह के इन घरों में जानवरों की आमद-ओ-रफ़त है । मिंबर-ओ-महिराब उदास होगए हैं । ख़ाना ख़ुदा में कोई चिराग़ जलाने वाला भी नहीं , इस सूरत-ए-हाल का क़ारईन कौन ज़िम्मेदार है ?

इन दोनों मसाजिद में नमाज़ पर पाबंदी की वजह से यहां ज़ेर तालीम मुस्लिम तलबा में बे चैनी पाई जाती है क्यों कि यहां दूर दूर तक कोई और मस्जिद नहीं है । इन तलबा का मुतालिबा है कि जल्द अज़ जल्द इन मसाजिद में नमाज़ की अदाएगी की इजाज़त दी जाय । ज़ुलम तो ये है कि नमाज़ जुमा अदा करने की भी इजाज़त नहीं है ।

इन दोनों मसाजिद की गैर आबादी की ज़िम्मेदारी रास्त तौर पर वज़ीर अकलियती बहबूद जनाब अहमद उल्लाह को जाती है जो उर्दू मीडिया से बहुत दूर रहते हैं और जब कभी उन्हें मौक़ा मिलता है तो कांग्रेस की तारीफ करते नहीं थकते , आख़िर हुकूमत के सामने कौनसी इतनी बड़ी रुकावट है कि इन मसाजिद को आबाद नहीं किया जा रहा है जब कि 8 सितंबर 2008 को एक एम एल ए ने यूनीवर्सिटी के इस वक़्त के वाइस चांसलर डाक्टर पी राघवा रेड्डी को अपने चैंबर में तलब किया था और दोनों मसाजिद में नमाज़ों की अदाएगी पर तबादला ख़्याल भी किया था

लेकिन वो भी बेसूद (बे फाइदा)रहा । हैरत तो इस बात पर है कि रियासती हुकूमत और मर्कज़ी हुकूमत दोनों एक ही जमात से मुताल्लिक़ हैं । इस इलाक़ा के रुकन पार्ल्यमंट जे पाल रेड्डी का भी बरसर-ए-इक्तदार हुकूमत से ही ताल्लुक़ है । इन तमाम चीज़ों के बावजूद नामालूम किन वजूहात की बिना पर नमाज़ की इजाज़त नहीं मिल रही है । ये हुकूमत अक़लियत दोस्ती के बे बुनियाद दावे करती है और दीगर (दूसरे) जमातों का ख़ौफ़ दिलाकर मुस्लमानों के वोट पर क़ाबिज़ होती है । लेकिन ये दोस्ती सिर्फ वोट हासिल करने तक ही महिदूद रहती है ।

अमली मैदान में बरसर-ए-इक्तदार हुकूमत बिलकुल सिफ़र (जीरो)है । अक़लियत नवाज़ी के नारे सिर्फ़ नारे हैं उन की कोई हक़ीक़त नहीं , बरसर-ए-इक्तदार हुकूमत का जब कोई लीडर टोपी पहन कर , भरे मजमा में मुस्लमानों को अस्सलाम अलैकुम कहता है तो इस से हमारी क़ौम ख़ुशी में झूम उठती है और नारों और तालियों से पूरी फ़िज़ा गूंज उठती है जब कि ये तमाम हीला और क़रबत ज़ाहिर करने के तरीके और अलफ़ाज़ सिर्फ़ धोका है इस हुकूमत का असल चेहरा देखना हो तो अमली मैदान का जायज़ा लिया जाय जहां ये चारों ख़ाने चित्त नज़र आती है ।

बरसर-ए-इक्तदार हुकूमत के वज़ीर अकलियती बहबूद को चाहीए कि हुकूमत की तारीफ के पुल ना बांधें बल्कि फ़ौरी इन दोनों मसाजिद का दौरा करें मुआइना करें , और तमाम तफ़ासील से आगही हासिल कर के जल्द अज़ जल्द नमाज़ से पाबंदी हटाएं ताकि यूनीवर्सिटी में मौजूद ज़ेर तालीम मुस्लिम तलबा और स्टाफ़ की बे चीनी को दूर किया जा सके ।।

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