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एमपी में गौहत्या के बाद भड़के दंगों की जांच का मामला : पुलिस की निष्क्रियता पर नाराज सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने मध्य प्रदेश में वर्ष 2013 में कथित गौहत्या के कारण भड़के साम्प्रदायिक दंगों के सिलसिले में स्थानीय पुलिस को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि संबंधित सांप्रदायिक दंगों के सिलसिले में फोटोग्राफ और वीडियो का उसने परीक्षण ही नहीं किया।

 

 
मुख्य न्यायाधीश जे एस केहर की अध्यक्षता वाली तीन-सदस्यीय पीठ ने सवाल किया कि आखिर शरारती तत्व कौन थे? न्यायालय ने कहा कि राज्य सरकार की दलील है कि उसने उन व्यक्तियों की पहचान ही नहीं की, क्योंकि भीड़ में करीब 200 लोग थे। हरदा जिले के छीपबड़ थाना क्षेत्र के खिरकिया और खेड़ा में गौहत्या की अफवाह में हुए उपद्रव के मामले में समाजवादी जन परिषद के अनुराग मोदी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की।

 

 

 

 

 

 

मुख्य न्यायाधीश की बेंच ने 17 जुलाई को मामले में दर्ज 12 एफआईआर के जांच करने वाले सारे पुलिस अधिकारियों को तलब किया है। याचिकाकर्ता की वकील प्योली के तर्क पर आदेश देते हुए कोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारी अपने साथ सारे कागजात लेकर आएं और कोर्ट को इस बात से संतुष्ट करे कि क्यों उन्होंने दंगे के दौरान बने वीडियो और फोटोग्राफ को फॉरेंसिक जांच के लिए नही भेजा?

 

 

 

 

 

 

घटना के दूसरे दिन हरदा डीएम व्दारा मुख्य सचिव को भेजी गई रिपोर्ट में बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद और गौरक्षक कमांडो फोर्स व्दारा उपद्रव भड़काने की बात होने के बावजूद उनके नाम चार्जशीट में क्यों नहीं आए? सुप्रीम कोर्ट के 17 फरवरी के आदेश के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने दंगे में दर्ज 12 एफआईआर की जांच रिपोर्ट पेश की थी। उससे उक्त तथ्य उजागर हुए है। इस मामले में याचिकाकर्ता अनुराग मोदी ने सीबीआई जांच की मांग की है।

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