“एहसान जाफ़री पे भी आतंकवादी का टैग लगा ही दो जज साहब”

“एहसान जाफ़री पे भी आतंकवादी का टैग लगा ही दो जज साहब”
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सोचिये ख़ून की प्यासी भीड़ आपके दरवाज़े पर खड़ी है और आपको मार कर काट फेंकने का दावा कर रही है, ये भीड़ सिर्फ़ ज़बान से नहीं तलवार, त्रिशूल, मशालें,बम और बंदूके लेकर आप पर हमला करने को तैयार है और आपकी ज़िम्मेदारी है कि आप आपके पास मदद के लिए आये लाचार लोगों को बचाएं. आप उनसे बात करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उन्हें सिर्फ़ ख़ून चाहिए, Facebook पे हमारे पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करिये

आप इस देश के हर बड़े लीडर से बात करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन कोई आपकी मदद नहीं कर पा रहा और जो एक आदमी शायद मदद कर सकता है वो फ़ोन के दूसरी तरफ़ से बोलता है कि वो हैरत में है कि अभी तुम मरे नहीं लेकिन फिर भी हमारी एक अदालत के एक जज ने ये बात कही है कि भीड़ तो एहसान जाफ़री के गोली चलाने से भड़की तो अगर जज साहब ने ये बात कही है तो सही ही होगी, वो बज़ाहिर चीज़ों को देख रहे होंगे लेकिन मैं एक आम इंसान होने के नाते पूछता हूँ कि वो भीड़ आख़िर वहाँ गयी क्यूँ थी? और इतना “साज़ो सामान” ये ‘शरीफ़’ भीड़ वहां लेकर गयी थी या एकदम से जैसे गोली चली जादू से सारे हथियार पैदा हो गए.

मुझे इस मुक़दमे से ख़ास कोई उम्मीद नहीं थी बस ये ही था कि कुछ लोगों को सज़ा हो जायेगी तो शायद आगे कोई इस तरह का काम करने से डरे, असल में जो लोग इस तरह के मुक़दमे लड़ रहे होते हैं उन्हें इंसाफ़ चाहिए होता है और थोड़ी सी इंसानियत भी. अक्सर अदालतें इंसाफ़ करने में वक़्त लगाती थीं लेकिन इंसानियत के नाम पे कुछ बेहतर रवैय्या रहता था पर अब शायद इंसानियत नाम की चीज़ भी किसी में बची नहीं है और इसी वजह से एहसान जाफ़री मरते मर जाते हैं, सैंकड़ों लोगों की लाशें अहमदाबाद की सड़कों पे सड़ जाती हैं, औरतों का यहाँ तक छोटी छोटी बच्चियों का बलात्कार किया जाता है, औरतों के सीने काट के फ़ेंक दिए जाते हैं और लाखों बेघर हो जाते हैं (जी बेघर, पलायन शब्द मैंने आपके लिए रख छोड़ा है) और तो और वो लोग जिन्होंने औरतों को नंगा किया, उनका बलात्कार किया, उनके पेट के बच्चों को बाहर निकाल लिया, आदमियों के जिस्म को काट के फ़ेंक दिया, उनके कटे हुए सरों से ‘फुटबॉल’ खेला, बच्चों को जिंदा जलाने वाले ये लोग भी आज कुछ लोगों के लिए हीरो का दर्जा रखते हैं. मुझे हैरत है वो लोग जो इस तरह के वाक़यों में शामिल रहे हैं वो किसी के लिए हीरो हो सकते हैं.

वैसे पिछले सालों में दुनिया भर में कुछ इस तरह का मामला बन गया है कि अगर कोई ग़ैर मुस्लिम गोली चलाता है तो वो पागल या अपराधी क़रार दिया जाता है और अगर कोई मुसलमान ऐसा कुछ करता है तो वो आतंकवादी.अब गोली तो चलाई है एहसान जाफ़री ने, वो भले ही सैंकड़ों लोगों को, औरतों को,बच्चों को बचाने के लिए चलाई हो…गोली चलाई है और मुसलमान ने गोली चलाई है तो आतंकवादी का टैग तो बनता है ना जी.

(अरग़वान रब्बही)
(लेखक के निजी विचार हैं)

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