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ओवैसी ने उड़ाई लालू और नीतीश की नींद..!

बिहार इलेक्शन की तारीखें भले ही ऐलान न हुई हैं, लेकिन सूबे में सियासी पार्टी अभी से इंतेखाबी तैयारियों में कूद गयी हैं। खास बात यह है कि इस बार पहली मरतबा हैदराबाद की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी एआईएमआईएम भी बिहार इलेक्शन में अपनी पहचान का इम्तेहान देने उतरी है।

हैदराबाद की इस पार्टी के चीफ असदुद्दीन ओवैसी जुनूबी से निकलकर अब मशरिक में बिहार इंतेखाबात से क़ौमी सियासत में मुस्लिम सियासत का नया चेहरा बनकर उभरने की कोशिश में है। यही वजह है कि पार्टी के चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने बिना किसी ताखीर किसनगंज रैली के साथ ही रियासत के मुस्लिम वोट बैंक को रिझाने का काम शुरू कर दिया है।

किसनगंज की रैली इंतेखाबी हिकमत अमली के हिसाब से इसलिए सुर्खियों में है क्‍योंकि रैली में ओवैसी ने जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस इत्तेहाद के साथ-साथ एनडीए पर भी जमकर हमला बोला है। जानकार और सियासत के माहिर मानते हैं कि मुस्लिम सियासत में अपनी पहचान बनाने के लिए ओवैसी को शायद ही इससे बढ़िया प्लेटफॉर्म मिले, यही वजह है कि ओवैसी ने मौके पर चौका लगाने की पूरी तैयारी कर ली है।

हमें इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि हैदराबाद में दबदबा रखने वाली एआईएमआईएम ने इससे पहले महाराष्ट्र चुनाव में अपनी जोरदार हाजिरी दर्ज करवाई है। ऐसे में इस बात में कोई दो राय नहीं कि वे बिहार इलेक्शन के जरिए क़ौमी सियासत में एंट्री की तैयारी करना चाहेंगे।

हालांकि बिहार में ओवैसी की पार्टी कितनी सीटों पर लड़ेगी यह अभी तय नहीं हो पाया है, लेकिन अपने इंतेखाबी तकरीर में जिस तरह ओवैसी ने सीमांचल के मुद्दों को उठाया उससे साफ था कि एमआईएम सीमांचल के सूबे में 20 से 25 उम्मीदवारों को उतार सकती है।

अब अगर एक नजर ओवैसी की सियासी रियाज़ी (Mathematics) पर डालें तो पूरे बिहार में 15 फीसदी से ज्‍यादा मुस्लिम वोटर हैं। ऐसे में इस बात में कोई शक और शुबह नहीं होना चाहिए कि उनकी पार्टी पूर्णिया, भागलपुर,किशनगंज, अररिया, कटिहार, सहरसा और आसपास के इलाकों में इंतेखाबी रियाज़ को बदलने की सलाहियत रखती है क्‍यों‍कि यहां मुस्लिम वोटर अच्छी तादाद में है।

फिर यह नहीं भूला जाना चाहिए कि 2014 के लोकसभा इंतेखाबात में इन सीटों पर बीजेपी बुरी तरह हारी थी। ऐसे में यहां से रैली की शुरुआत लालू, नीतीश की नींद उड़ा सकती है।

गौर करने वाली बात है कि मुस्लिम वोट बैंक को लालू का बुनियादी वोट माना जाता है और ओवैसी अगर इस मुस्लिम अक्सरियत वाले इलाके में उम्मीदवार उतारते हैं तो फिर लालू-नीतीश के वोट बैंक में सेंध लगना तय माना जा रहा है। दरअसल, ओवैसी कि नजर अब सीमांचल के अक्लियती वोटरों पर ही लगी है और यह इलाका सियासी मसावात के लिए भी काफी अहम है।

अगर इस इलेक्शन में ओवैसी सीमांचल के सूबे में कामयाब होते हैं, तो इसमें कोई शक नहीं कि पूरे बिहार का सियासी मसावात बदल सकता है। सीमांचल सूबे के किशनगंज में 70, अररिया में 42, कटिहार में 41 और पूर्णिया में 20 फीसदी मुस्लिम वोटर्स हैं।

गौरतलब है कि बिहार में जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस इत्तेहाद को मुस्लिम वोट मिलने के इम्कान सबसे ज्यादा हैं। खासकर लालू और नीतीश की उम्मीदें इस इलेक्शन में मुस्लिम-यादव मसावात पर ही टिकी है। ऐसे हालात में बिहार में ओवैसी के ऊरूज़ से इलेक्शन में लालू-नीतीश के वोटों में सेंध लग सकती है।

अगर एमआईएम की तारीख पर नजर डालें तो तकरीबन 20 साल तक सिर्फ हैदराबाद Municipal elections तक महदूद रहने वाली एमआईएम ने 2014 में तेलंगाना विधानसभा इंतेखाबात में अपनी हाजिरी दर्ज कराई। आवाम की बढती हिमायत ओवैसी बिहार में मुस्लिम वोट बैंक वाली पार्टियों के लिए एक खतरे की घंटी है।

अब तक इन सियासी पार्टियों ने अपने आपको अक्लियतों का हमदर्द जरूर बताया है, लेकिन सिर्फ वोट बैंक की सियासत लिए ना कि उनकी हालत और सिम्त सुधारने के लिए।

मुतबादिल मुस्लिम लीडर की कमी में और सामाजी इक्तेसादी हालात में पिछड़े अक्लियतों के लिए ओवैसी अचानक एक आप्शन बन सकते हैं।

ओवैसी की मकबूलियत मुसलमानों में मुसलसल बढ़ती जा रही है। यही नहीं ओवैसी की पार्टी अब दलितों को भी अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर रही है। मुस्लिम मुद्दों के साथ-साथ ओवैसी ने दलितों की मुसीबतों को भी मुद्दा बनाया है और ऐसे में अगर ओवैसी अपने मंसूबों को अंजाम तक पहुंचाने में कामयाब रहे तो मांझी और पासवान सरीखे दलित लीडरों के लिए भी परेशानियां बढ़ सकती हैं।

गौरतलब है औरंगाबाद के बलदियाती इंतेखाबात में एमआईएम ने बड़ी तादाद में गैर-मुस्लिम उम्मीदवारों को भी टिकट दिया था।

वाइल्ड कार्ड के जरिए बिहार इंतेखाबात में उतरे पैराशूट लिईडर ओवैसी को हल्‍के में लेने की भूल न तो सियासी तजजियाकार कर सकते हैं और न ही सियासतदां । बिहार के बाद मगरिबी बंगाल और उत्तर प्रदेश के विधानसभा इंतेखाबात भी अगले दो साल के अंदर होंगे और ऐसे में ओवैसी का उरूज़ मुस्लिम वोट बैंक की सियासत करने वाले लिईडरों के लिए बहुत इशारा नहीं है।

बिहार के मस्लिम अक्सरियत वाले इलाकों में सर्वे करने पर यह साफ जाहिर है कि मुस्लिम नौजवानो में ओवैसी की अच्छी-खासी पकड़ है। अब तक अपने मुतनाज़ा बयानों और भड़काऊ तकरीरों के सबब अक्सर सुर्खियों में भी बना रहने वाला यह शख्स अब मुल्क में मुस्लिम सियासत का नया चेहरा बन कर उभर रहा है। बिहार में ओवैसी और उनकी पार्टी की आवामी हिमायत बेशक ना हो, लेकिन इलेक्शन में उतरने के ऐलान भर से सियासी पार्टी अलर्ट हो गए है।

सियासी तजजियाकार भी इस बात से इंकार नहीं कर रहे कि मुस्लिम वोटों के लिए छिड़ी इस जंग में ओवैसी की पार्टी आने वाले विधानसभा इलेक्शन में मुबय्यना तौर से सेक्युलर पार्टियों का खेल बिगाड़ सकती है और यह बीजेपी के लिए एक अच्छी खबर हो सकती है।

मुस्लिम वोट बैंक में बिखराव बीजेपी की सत्ता तक पहुंच आसान बनाएगी।

एमआईएम के सियासी मसावात देखते हुए बीजेपी के साथ इसके बिलावास्ता तौर पर साठ-गांठ के इल्ज़ाम भी लग रहे है। बहरहाल, जो भी हो बिहार इलेक्शन का यह खेल वक्त और बदलते मोहरों के साथ काफी दिलचस्प होता जा रहा है और आखिर में इलेक्शन के नतीजे से ही तय होगा कि सत्ता तक पहुंचने में कौन कामयाब होता है।

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