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औरतों को लेकर इस्लाम संकीर्ण नहीं बल्कि मर्दवादी मजहबी ढांचा जिम्मेवार है

सारी बंदिशें, सारी रुकावटें व रोक-टोक और हर क़ानून (धार्मिक क़ानून) क्या सिर्फ औरतों के लिए बनी है, या बनाई गई है. ये अंतरद्वंद भी बड़ा विचित्र सा लगता है. जो बंदिशें बनी है या बनाई गई है इन दोनों के दायरे में अगर सिर्फ एक ही जाति (औरत) ही आती है तो सवाल उठना लाजिम है कि ये कौनतय कर रहा है जिसमें एक जाति (औरत) पिंजरे के अंदर होती है दूसरी जाति मर्द बाहर. फिलहाल बहस जो बनी है उसपर नहीं जो बनाई गई है उसपर है.


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औरत इस्लाम के नज़रों में कुछ और है लेकिन इस्लामी प्रचलन में कुछ और. तो क्या हम मान लें कि कोई औरत जो पिंजरे के बाहर उड़ना चाहती है या ज़िंदगी को जीना चाहती है उसे जीने का पूरा हक़ इस्लाम तो देता है लेकिन शायद मुस्लिम समाज नहीं देता. जब बात महिलाओं की अधिकार की बराबरी की होती है तो अक्सर ध्यान मजहब के दायरे औरतों को कितना अधिकार और बराबरी मिला है उसपर होनी शुरू हो जाती है. क्योंकि औरतों की बराबरी के मामले में मजहब बीच में आ जाता है. खासकर सबकी निगाहें इस्लाम की ओर चली जाती है. इस्लाम के दर्शन पर नज़र डाले तो ऐसा लगता है कि इस्लाम में सबकी बराबरी की बात कही गई है उनमें औरतें भी शामिल है. जिसके तहत औरतों को सारे इंसानी अधिकार है वहीं दूसरी तरफ आवाज उठती है कि इस्लाम में औरतों को अधिकार मिलना नामुमकिन है. तीसरे बिंदु पर ध्यान तो इस्लाम के नाम पर जो राजनीति होती है उसकी शिकार भी औरतें होती रही हैं. 1986 के शाहबानों केस पर ध्यान दें तो मुस्लिम कट्टरपंथीयों के साथ तमाम उदारवादी भी खड़े थे जिससे मुसलमानों को एक खास तरह की राजनीति के चश्मे से देखने की मानसिकता का पता चलता है. इस्लाम में कहा गया है कि तालिम हासिल करने आप समुद्र पार भी जा सकते हैं. मतलब यह है कि शिक्षा महत्वपूर्ण है और हर किसी के लिए हैं. इसमें मर्द और औरत का बंटवारा नहीं किया गया है और ना ही शिक्षा मजहबी हो या दुनियावी लेकिन ज्यादातर औरतें के लिए मजहबी तालिम लेने पर ही जोर दिया जाता है. उस मजहबी तालिम में भी औरतों का मस्जिद के अंदर जाने पर पाबंदी. कुरान हो या हदिश हर जगह महिलाओं को पारिवारीक,आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व का अधिकार देता है. लेकिन यह अधिकार मुसलमानों का समाज क्यों औरतों से क्यों छीनना चाहता है. क्या ये लैंगिक सत्ता की लड़ाई है जिसे मर्द मजहब की आड़ में पूरी तरह से अपने कब्जे में रखना चाहता है. इसका मतलब साथ है कि औरतों को लेकर इस्लाम संकीर्ण नहीं बल्कि मर्दवादी मजहबी ढांचा जिम्मेवार है. इस्लाम के अंदर जितना हक़ मर्द का औरत पर है उतना ही औरत का मर्द पर है. मुसलमानों के बीच जिसतरह से पर्दा प्रथा को बढ़ावा दिया जा रहा है वो उसतरह से कभी भी इस्लाम में नहीं रहा है. आज जिसतरह से मुसलमान औरतों के कपड़े पहनने और चलने पर दिशानिर्देश दिया जाता है उसे इस्लाम ने कभी कहा ही नहीं. इस्लाम में औरत मर्द दोनों को ढिले कपड़े पहनने व नज़र नीचे करके चलने को कहा गया है. कुरान के 24वें अध्याय, प्रकाश की तीसवीं आयत में आस्थावान पुरुषों और औरतों दोनों को एक ही तरह की हिदायत दी गई है.

राहिला परवीन
राहिला परवीन
लेकिन आज मुस्लिम समाज बड़ी चलाकी से इसे सिर्फ औरतों के लिए ही तय कर रखा है. मज़े की बात यह है कि जिसतरह मर्दवादी सामाजिक ढांचे के तहत औरतों को कैद करके रखा जाता है. उसी तरह अपने फायदे के लिए आज़ाद भी कर दिया जाता है बस सिर्फ तीन बार तलाक़ बोल कर. लेकिन जितनी आसानी से मुसलमानों के बीच तलाक़ दिया जाता है वैसा है नहीं और आश्चर्यजनक रूप से यह सिर्फ भारत में ही होता है. तलाक़ देने के कायदे के हिसाब से पहली बार तलाक कहने के एक महीने बाद दूसरी बार तलाक़ कहा जाता है. बीच में महीने भर का वक्त इसलिए दिया जाता है ताकि दोनों के बीच आपसी ताल्लुकात ठीक हो सके और फिर से एक होने की उम्मीद बनी रहे. ऐसा हरगिज नहीं है कि अपनी मर्जी से जब चाहे जैसे चाहे तलाक़ दे दे. अगर हम निकाह पर ध्यान दे तो निकाह पहले औरतों का होता है. जिसे यह साबित होता है कि औरतों की मर्जी पहले जानी जाती है. निकाह करवाने वाले मौलवी साहब तीन बार पूछते हैं कि अपनी मर्जी से यह निकाह कबूल है या नहीं. इससे औरतों की मर्जी की अहमियत का अंदाजा लगाया जा सकता है. मुसलमान औरत को 1400 बरस पहले ही सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मामलों में बराबरी का मुकाम और फैसले लेने का हक़ दे दिया गया था. उसे आज मर्दवादी समाज ख़ुद छीन लेती है. अक्सर आप कहते सुनिएगा कि इस्लाम में लोग सोचते-समझते नहीं क्योंकि इस्लाम सोचने की इजाज़त नहीं देता जबकि कुरान में कई बार अक्ल शब्द का प्रयोग हुआ है. अगर आपको कुछ समझ में नहीं आ रहा है तो आप अपने अक्ल का इस्तेमाल करें इस बात का जिक्र हदिश में किया गया है. इस्लाम में ठहरे हुए पानी को साफ (पाक) नहीं बताया गया और पीने लायक नहीं बताया गया है यानि बहता पानी ही साफ है तो आप समझ सकते हैं कि जिस मजहब ने ठहरे हुए पानी को नहीं अपनाया वो ठहरी हुई सोच को कैसे बढ़ावा देगा. इसलिए इस संदर्भ में मुस्लिम समाज को आत्मावलोकन की आवश्यकता है और वहीं मुस्लिम औरतों को अपने मजहबी और नागरिकीय अधिकारों के प्रति सजग होने की जरूरत है.

राहिला परवीन
लेखिका -जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी में रिसर्च स्कॉलर है

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