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कसाब कैसे बना दहशतगर्द…………….

नई दिल्ली, २२ नवंबर: (एजेंसी) 26 नवंबर, 2008, रात करीब 8 बजे का वक्त। हमेशा की तरह मुंबई में अच्छी खासी चहल पहल थी। दहशतगर्दो के नापाक इरादों से पूरी तरह बेखबर यह शहर अपनी ही तेज रफ्तार से आगे बढ़ रहा था।

नई दिल्ली, २२ नवंबर: (एजेंसी) 26 नवंबर, 2008, रात करीब 8 बजे का वक्त। हमेशा की तरह मुंबई में अच्छी खासी चहल पहल थी। दहशतगर्दो के नापाक इरादों से पूरी तरह बेखबर यह शहर अपनी ही तेज रफ्तार से आगे बढ़ रहा था।

…और इसके बाद मुंबई की रफ्तार एकाएक थमने लगी। मुल्क की राजधानी पर सबसे बड़ा आतंकी हमला शुरू हो गया। कैसे दिया गया इतनी बड़ी साजिश को अंजाम। दहशत के इस सफर की कहां से हुई शुरुआत और कैसे देखते ही देखते एक मजदूरी करने वाला बन गया मुंबई हमलों का गुनहगार।

नायर अस्पताल में मुंबई पुलिस को दिए बयान में दहशतगर्द मोहम्मद आमिर अजमल कसाब ने खुद बताई अपनी कहानी…

नाम : मोहम्मद आमिर अजमल कसाब
उम्र : 25 साल
पिता का नाम : मोहम्मद आमिर कसाब
पेशा : मजदूर
शिक्षा : चौथी कक्षा
पता : फरीदकोट, तहसील दिपालपुर, पंजाब, पाकिस्तान

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सबसे पहले कसाब ने अपने घर वालों के बारे में बताना शुरू किया। उसने वालदा का नाम नूर इलाही और वालिद का नाम आमिर बताया। घर की बदहाल माली हालत कसाब के अल्फाज़ो से बयां हो रही थी। वह कह रहा था कि मेरे वालिद दही बड़े बेचते थे तो वह खुद भी एक कंस्ट्रक्शन साइट पर मजदूरी करता था।

बड़े भाई अफजल और छोटे भाई मुनीर के बारे में पूछे गए तकरीबन हर सवाल का जवाब वह बेझिझक दे रहा था। उसने बताया कि अफजल की बीवी का नाम साफिया है और उसके दो बच्चे भी हैं। लड़के का नाम आदिल है और लड़की का नाम कसाब को मालूम नहीं था। मुनीर के बारे में कसाब ने बताया कि वह सकूल (स्कूल) जाता है।

कसाब को अपने स्कूल का नाम याद नहीं था। इतना जरूर कहा कि वह एक प्राइमरी स्कूल था। उसने चौथी क्लास तक उर्दू जबान में पढ़ाई की थी। साल 2000 में स्कूल छोड़ा तो गरीबी ने कसाब को मजदूरी करने पर मजबूर कर दिया। कुछ वक्त के बाद वह लाहौर में लेन नंबर 54, तोहिदाबाद मोहल्ले के मकान नंबर 12 में रहने लगा। यहां 2005 तक रहा। इस दौरान नौकरी की तलाश में फरीदकोट आना-जाना भी चलता रहा। दहशगर्दी तंज़ीम लश्कर‍ ए‍ तएबा से जुड़ाव के बारे में कसाब ने पहली बार मुंह खोला। कहा कि वालिद आमिर ने उसे एक दिन अपनी गरीबी का हवाला देते हुए दफ्तर वालों (जकी उर रहमान, जिसे कसाब चाचा कहता था) से मिलवाया।

दफ्तर वालों ने फिर उसे आगे ट्रेनिंग के लिए भेज दिया। उसे यकीन दिलाया गया कि काम में भले ही खतरे का है, लेकिन इससे उसके घर वालों की इज्जत बढ़ेगी।

कसाब को आतंक की तर्बीयत शुरू होने का महीना, तारीख या वक्त याद नहीं है, लेकिन ट्रेनिंग कैंप में उस वक्त साबिक पाकिस्तानी वज़ीर ए आज़म बेनजीर भुट्टो के कत्ल की वारदात की बात की जा रही थी। इसका मतलब यह हो सकता है कि उसकी ट्रेनिंग दिसंबर 2007 में शुरू हुई। मनसेरा के बेतल गांव में करीब 25 और नौजवानो के साथ कसाब को दहशत की ट्रेनिंग दी गयी।

आपस में बात करने की सभी को मनाही थी। सिलसिला 3 महीने तक चला। इस ऑपरेशन के इंचार्ज अबू इस्माइल को हमले से करीब एक महीने पहले कसाब से मिलवाया गया। दोनों को कहा गया, ‘यारो आज मौका आ गया तुम्हारी आजमाइश का।’ एक सीडी दिखाई गई, जिसमें टारगेट की जानकारी थी। उन्हें बताया गया था कि किस तरफ से टार्गेट की ओर बढ़ना है। इस रास्ते में आजाद मैदान भी था। सीएसटी पर मौजूद लोगों को मारने के लिए कहा गया।

हिंदुस्तान में दहशत फैलाने वाले कसाब को जिहाद का मतलब नहीं पता था। उससे पूछा गया तो उसने यही जवाब दिया। कहा, मुझे पता नहीं जिहाद क्या होता है। मगर वे (लश्कर) कहते थे कि इसका मतलब जन्नत से है। मैंने बस पैसों के लिए यह सब किया। कितना पैसा मिला, पूछने पर उसने कहा कि मेरे पिता को लाखों के हिसाब से दिया होगा, मुझे बताया नहीं।

हालांकि शक भी कसाब के दिमाग में था कि हो सकता है कि उसके पिता को पैसे न मिले हों। शायद इसीलिए उसने कहा कि हो सकता है कि मुझे उन लोगों (लश्कर) ने मोहरा बनाया हो।

अजीजाबाद के पास के गांव कासम से लश्कर के दस आतंकी समुद्र के रास्ते के जरिए इस साजिश को अंजाम देने के अपने मिशन पर निकल चुके थे। समुद्र का आधा सफर सभी ने पहले एक बोट के जरिए पूरा किया। इसके बाद सभी दो-दो के ग्रुप में बंटकर डिंगियों के सहारे मुंबई के साहिल पर मच्छीमार कॉलोनी उतरे। कसाब के साथ दूसरा दहशतगर्द इस्माइल था। यहां से दोनों ने सीएसटी के लिए टैक्सी ली। हर दहशतगर्द ( आतंकी) के पास आठ हैंड ग्रेनेड और एके-47 राइफल थे। आखिरकार 26 नवंबर को रात करीब 8 बजे आतंक का सिलसिला शुरू हो गया। जो अगले तीन दिनों तक बदस्तूर जारी रहा।

ट्रेनिंग देने वाले लोगों ने कसाब से कहा कि तुम जन्नत में जाओगे, तब उसने कहा कि मुझे यहां नहीं रहना। कसाब ने बताया कि वाक्या वाले दिन उसने दो से ढाई मैगजीन खाली कर दी थी। कसाब के मुताबिक मुझे कहा गया था कि जब तक जिंदा रहो, लोगों को मारते रहो। … मगर हम भी इंसान हैं यार। यह कहते-कहते वह फूट-फूटकर रो पड़ा।

मासूम लोगों को मौत के घाट उतारने के बाद कसाब को अब अपने किए का पछतावा हो रहा था। उसने बताया कि पकड़े जाने के करीब एक घंटे बाद वह फूट-फूटकर रोया। उसने कहा कि मैंने बहुत गलत किया। एक दूसरे बयान में वह बोला, इस काम के लिए अल्लाह मुझे कभी माफ नहीं करेगा।

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