Sunday , September 23 2018

क़िला गोलकुंडा में नए बोर्ड्स नस्ब, उर्दू नज़र अंदाज

उर्दू ज़बान पर अमल आवरी और उस की तरक़्क़ी के ताल्लुक़ से हुकूमत के वाअदे, एलानात और हिदायात अहले ज़बान को ख़ुश करने की एक नाकाम कोशिश साबित हो रही है क्यों कि हुकूमत के इन एलानात और हिदायात के बावजूद सरकारी ओहदेदारों की उर्दू से खुली द

उर्दू ज़बान पर अमल आवरी और उस की तरक़्क़ी के ताल्लुक़ से हुकूमत के वाअदे, एलानात और हिदायात अहले ज़बान को ख़ुश करने की एक नाकाम कोशिश साबित हो रही है क्यों कि हुकूमत के इन एलानात और हिदायात के बावजूद सरकारी ओहदेदारों की उर्दू से खुली दुश्मनी वक़्फ़ा वक़्फ़ा से ज़ाहिर हो रही है। हुकूमत एलानात और हिदायात को जारी करती है लेकिन सरकारी ओहदेदारों ने उर्दू दुश्मनी को अपना आदत बना लिया है। उर्दू के शहर में उर्दू को मिटाने की मज़मूम साज़िश के आए दिन सुबूत मिलते हैं।

सरकारी दूसरी ज़बान उर्दू को पुलिस स्टेशनों, दवाख़ानों, बसों और बस स्टप्स, रेलवे स्टेशन और दीगर अहम अवामी मुक़ामात पर से पहले ही ख़त्म कर दिया गया। उर्दू अदब और ज़बान का गहवारा और पहले साहब दीवान शायर क़ुली क़ुतुब शाह का ताल्लुक़ शहर हैदराबाद से है और अब शहर हैदराबाद से ही उर्दू को ख़त्म करने की कोशिश अपने उरूज पर पहुंच चुकी है क्यों कि क़िला गोलकुंडा के बाबुल दाखिला से 400 फीट बुलंदी पर मौजूद बालाहिसार तक अवाम की रहनुमाई और हर मुक़ाम की तफ़सीलात पर मुश्तमिल बोर्ड पर उर्दू को नज़र अंदाज कर दिया गया है।

मर्कज़ी हुकूमत के ज़ेरे इंतेज़ामीया गोलकुंडा क़िला में बाबुल दाखिला से लेकर बाला हिसार तक हर मुक़ाम और मैदान की तफ़सीलात फ़राहम करने और अवाम को मालूमात देने के लिए शानदार ग्रेनाईट के पत्थरों पर मुक़ामात की तफ़सीलात तेलुगु, हिन्दी और अंग्रेज़ी में मौजूद हैं लेकिन इन पत्थरों के साइन बोर्ड्स पर उर्दू को यक्सर ग़ायब कर दिया गया है।

हद तो यहां तक हो चुकी है कि क़िला गोलकुंडा में जो 5 मसाजिद हैं उन के नाम भी सिर्फ़ तेलुगु, हिन्दी और अंग्रेज़ी में रोमन तरीका से दर्ज हैं। उर्दूदां तबक़ा का ये आज अव्वलीन फ़र्ज़ है कि वो नई नसल को कम अज़ कम घरैलू सतह पर उर्दू ज़बान पढ़ना और लिखना सिखाएं बल्कि हुकूमती और दफ़्तरी सतह पर जहां उर्दू से नाइंसाफ़ी की जा रही है इस के ख़िलाफ़ मोअस्सर और क़ानूनी रास्ता अख़्तियार करें ताकि फिर किसी शोबा या ओहदेदार की हिम्मत ना हो कि वो उर्दू को मिटाने के मुताल्लिक़ सोच भी सके।

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