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कांस्टेबल की पिटाई करने वाला मुल्ज़िम रिहा

नई दिल्ली, १७ अक्टूबर ( पी टी आई) एक शख़्स को दिल्ली पुलिस के एक अहलकार को ज़िद-ओ-कूब ( मार पीट) करने और उसे अपनी डयूटी अंजाम ना देने की पादाश (प्रतिकार/ बदले) में गिरफ़्तार किया गया था ।

नई दिल्ली, १७ अक्टूबर ( पी टी आई) एक शख़्स को दिल्ली पुलिस के एक अहलकार को ज़िद-ओ-कूब ( मार पीट) करने और उसे अपनी डयूटी अंजाम ना देने की पादाश (प्रतिकार/ बदले) में गिरफ़्तार किया गया था ।

उसे दिल्ली की एक अदालत ने ये कह कर एक साल के लिए आज़माईशी तौर पर रिहा कर दिया कि मज़कूरा ( उक़्त) शख़्स ने मुक़द्दमा का दस तवील ( लंबे) सालों तक सामना किया । एडीशनल सेशन जज अशुतोश कुमार ने मुल्ज़िम भीम राव को मजसटरील अदालत (magisterial court) ने जुलाई 2012 के फ़ैसला को बरक़रार रखते हुए रिहाई का हुक्म सुनाया ।

मुल्ज़िम को अदालत ने इंतिबाह ( चेतावनी) भी दिया कि वो आइन्दा किसी भी मुजरिमाना सरगर्मी में मुलव्वस ना हो । अदालत ने इस्तिदलाल ( दलील) पेश किया कि भीम राव का ये पहला जुर्म था और जिस की सज़ा इस ने मुक़द्दमा की समाअत ( सुनवायी) के दौरान दस साल तक बर्दाश्त की ।

इलावा अज़ीं ( इसके अतिरिक्त) घर की कफ़ालत (भार व बोझ) इस के अकेले कंधों पर है । लिहाज़ा मुल्ज़िम को तर्बीयती या आज़माईशी तौर पर रिहा किया जाना चाहीए । भीम राव ने 2002 में एक हेड कांस्टेबल मुकेश की उस वक़्त पिटाई करदी थी जब कांस्टेबल ने उसे सुर्ख़ ( RED) लाईट ( सिगनल) के क़रीब रोकने की कोशिश की थी ।

भीम रा को अदालत ने कहा कि उसे आज़माईशी तौर पर सिर्फ इसलिए रिहा किया जा रहा है ताकि वो समाज में अपने अच्छे बरता से अपने ऊपर लगे दाग़ को धो सके । अच्छे किरदार और बरता का कोई मुतबादिल ( अद्ल बदल) नहीं ।

उम्र कैद की सज़ा काटने वाले क़ैदीयों को भी अच्छे बरताव की बुनियाद पर मीयाद (तय किए हुए समय) से पहले रिहा कर दिया जाता है ।

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